सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 149 · Raag Maajh · Guru Angad Dev Ji

1सत्यस्वरूप ब्रह्म का चिन्तन करने से उसने काल (मृत्यु) को नष्ट कर दिया है।

2यशोगान करने वाला चारण अकथनीय प्रभु की महिमा बखान करता है और प्रभु नाम से श्रृंगारा गया है अर्थात् उसका जन्म सफल हो गया है।

3हे नानक ! शुभ गुणों की पूँजी पकड़ कर रखने से उसने पूज्य परमेश्वर हरि से भेंट कर ली है॥ २३॥

4श्लोक महला १॥

5हम जीवों के जन्म पूर्वकृत किए पापों के कारण हुए हैं। हम जन्म लेकर अब फिर पाप किए जा रहे हैं और अगले जन्मों में भी हम पाप कर्मो में ही पड़ेंगे।

6हमारे यह पाप धर्म-कर्म करने से बिल्कुल ही नहीं मिटते, चाहे हम हजारों बार तीर्थ-स्नान करके पाप धोने का प्रयास ही कर लें।

7हे नानक ! यदि प्रभु क्षमादान कर दें तो यह पाप क्षमा कर दिए जाते हैं, अन्यथा अत्यन्त प्रताड़ना मिलती है॥ १ ॥

8महला १॥

9हे नानक ! यदि हम भगवान से दुखों को छोड़कर सुख ही माँगें, तो यह बोलना व्यर्थ ही है।

10सुख एवं दुख यह दोनों ही भगवान के दरबार से मिले हुए वस्त्र हैं, जिन्हें मानव दुनिया में आकर पहनता है।

11जहाँ बोलने से पराजित ही होना है, वहाँ चुप रहने में ही भलाई है॥ २॥

12पउड़ी॥

13चारों दिशाओं में ढूंढने के पश्चात मैंने परमात्मा को अपने हृदय में ही ढूंढ लिया है।

14उस अलक्ष्य, सद्पुरुष एवं सृष्टिकर्ता को देखकर कृतार्थ हो गया हूँ।

15मैं उजाड़ संसार में भटक गया था लेकिन गुरदेव ने मुझे सद्मार्ग दिखा दिया है।

16सत्य के पुंज सतिगुरु धन्य हैं, जिनकी दया से मैंने सत्य स्वरूप परमात्मा की आराधना की है।

17सतिगुरु ने मेरे अन्तर्मन में ही ज्ञान रूपी दीपक प्रज्वलित कर दिया है, जिससे मैंने अपने हृदय-घर में नाम रूपी रत्न को पा लिया है।

18गुरु के शब्द द्वारा सत्यस्वरूप परमात्मा की महिमा-स्तुति करके मैं सुखी हो गया हूँ और सत्यवादी बन गया हूँ।

19जिन लोगों को प्रभु का भय नहीं, उन्हें यम का भय लगा रहता है और वे अहंकार में ही नष्ट हो जाते हैं।

20नाम को विस्मृत करके संसार प्रेत की भाँति भटकता रहता है।॥ २४॥

21श्लोक महला ३॥

22मानव भय में जन्म लेता है और भय में ही प्राण त्याग देता है। जन्म-मरण के उपरांत भी उसके मन में भय ही बना रहता है।

23हे नानक ! यदि मानव प्रभु के भय में मरता है अर्थात् मानता है तो उसका जगत् में आगमन सफल सुखदायक हो जाता है।॥ १॥

24महला ३॥

25ईश्वर का भय धारण किए बिना प्राणी बहुत ज्यादा देर तक जीता और आनन्द ही आनन्द प्राप्त करता है।

26हे नानक ! यदि वह ईश्वर के भय बिना प्राण त्याग दे तो वह चेहरे पर कालिख लगा कर दुनिया से चला जाता है॥ २॥

27पउड़ी।

28जिस व्यक्ति पर सतिगुरु दयालु हो जाते हैं, उसकी श्रद्धा पूर्ण हो जाती है।

29जब सतिगुरु दयालु हो जाएँ तो मनुष्य कभी पश्चाताप नहीं करता।

30जब सतिगुरु दयालु हो जाएँ तो मनुष्य दुख को जानता ही नहीं।

31जब सतिगुरु दयालु हो जाएँ तो मनुष्य हरि की प्रीति का आनंद प्राप्त करता है।

32जब सतिगुरु जी दयालु हो जाएँ तो मनुष्य को यम का भय नहीं रहता।

33जब सतिगुरु जी दयालु हो जाएँ तो तन को सदा सुख प्राप्त होता है।

34जब सतिगुरु जी दयालु हो जाएँ तो नवनिधियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

35जब सतिगुरु दयालु हो जाएँ तो मनुष्य सत्य में ही समा जाता है।॥२५॥

36श्लोक महला १॥

37वह सिर के केश उखड़वाते हैं, मलिन जल पीते और दूसरों की जूठन बार-बार मॉगते और खाते हैं।

38वह गंदगी बिखेरते हैं, अपने मुख से गन्दी हवा लेते हैं और जल देखने से संकोच करते हैं।

39भस्म से लथपथ हुए हाथों से भेड़ों की भाँति वह अपने केश उखड़वाते हैं।

40माता-पिता के प्रति जो कर्म था अर्थात् उनकी सेवा की मर्यादा वह त्याग देते हैं और उनके सगे-संबंधी फूट-फूट कर अश्रु बहाते हैं।

41उनके लिए कोई भी पिण्डदान, पत्तल क्रिया नहीं करता है, न ही अन्तिम संस्कार करता है, न ही कोई मिट्टी का दीपक प्रज्वलित करता है। मरणोपरांत वह कहाँ फेंके जाएँगे ?

42अठसठ तीर्थ स्थान भी उनको आश्रय नहीं देते और ब्राह्मण उनका भोजन नहीं करते।

43वह सदा दिन-रात मलिन रहते हैं और उनके माथे पर तिलक भी नहीं।

44शोक करने वालों की भाँति वह समूह बना कर बैठते हैं। अथवा जैसे मृतक के घर महिलाएँ मुख पर कपड़ा डालकर शोक मनाती हैं और प्रभु-भक्तों के सत्संग में नहीं जाते।

45वे कमर से माँगने वाले प्याले लटकाते हुए और हाथों में धागों के गुच्छों सहित आगे-पीछे चलते हैं।

46न ही वह योगी हैं, न ही वह शिव के उपासक, न ही वह काजी और न ही मुल्लां हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं