गुरु ग्रंथ साहिब 148 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1यह कभी स्वर्ग रूपी चंदन के वृक्ष और कभी नरक रूपी आक की डाली पर बैठता है। यह कभी भगवान से भी प्रेम कर लेता है।
2हे नानक ! भगवान प्राणियों को अपनी इच्छानुसार चलाता है। यह रीति आदिकाल से प्रचलित है॥ २ ॥
3पउड़ी ॥
4कितने ही लोग भगवान के गुणों का बखान कर रहे हैं और कितने ही लोग बखान कर करके दुनिया से चले गए हैं।
5वेद भगवान के गुणों का बखान करते हैं परन्तु उसके गुणों का अंत नहीं पा सकते।
6पढ़ने से उसका भेद नहीं पाया जा सकता। उसका भेद ज्ञान से ही पाया जाता है।
7षट्दर्शन के छः मत हैं परन्तु उनके द्वारा कोई विरला पुरुष ही परमात्मा में लीन होता है।
8जिस प्राणी ने गुरु की शिक्षा से सच्चा अलख पुरुष पाया है, वह शोभायमान है।
9जिन्होंने अनन्त ईश्वर के नाम का चिंतन-मनन किया है, वह उसके दरबार में जाता है।
10मैं ढाडी (गायक) हूँ और सृष्टि के सृजनहार को प्रणाम करता उसका यशोगान करता रहता हूँ।
11हे नानक ! वह एक ईश्वर प्रत्येक युग में विद्यमान है और उसे ही अपने मन में बसाना चाहिए ॥ २१॥
12श्लोक महला २॥
13यदि कोई आदमी मन्त्र तो बिच्छू का जानता हो, लेकिन सपों को जाकर पकड़ ले तो वह अपने हाथों से स्वयं अपने आपको अग्नि का लूका लगा लेता है।
14आदिकाल से ही ईश्वर का यह हुक्म हुआ है कि जो बुरा करता है वह भारी ठोकर खाता है।
15जो मनमुख इन्सान गुरमुख से विरोध करता है, वह नष्ट हो जाता है। यही सच्चा न्याय है।
16लोक एवं परलोक दोनों तरफ का न्याय करने वाला मालिक-प्रभु स्वयं ही न्याय करके देखता है।
17हे नानक ! इसे इस तरह समझो कि सबकुछ परमात्मा की इच्छानुसार ही हो रहा है॥ १॥
18महला २॥
19हे नानक ! यदि मनुष्य अपने आप को परखे, केवल तभी उसे पारखी समझो।
20यदि मनुष्य रोग एवं औषधि दोनों को समझता हो तो ही वह चतुर वैद्य है।
21मानव को चाहिए कि वह इस दुनिया में स्वयं को एक अतिथि समझे तथा धर्म-मार्ग पर चलता हुआ दूसरों से विवाद मत करे।
22वह जगत् के मूल प्रभु को समझकर दूसरों से प्रभु बारे विचार-विमर्श करे। वह दुनिया में नाम-सिमरन:करने आया है तथा उसे कामादिक हानिकारक पापों को नष्ट कर देना चाहिए।
23जो लालच के मार्ग पर नहीं चलता और सत्य में वास करता है, वह मध्यस्थ ही प्रभु के दरबार में स्वीकृत होता है।
24यदि बाण आकाश को मारा जाए, वह बाण किस तरह वहाँ पहुँच सकता है ?
25ऊपर वह आकाश अगम्य है, इसलिए समझ लीजिए कि बाण उलटकर बाण चलाने वाले पर ही लगेगा ॥ २॥
26पउड़ी।
27जीव-स्त्रियाँ अपने प्रभु-पति से मुहब्बत करती हैं और उन्होंने प्रेम का श्रृंगार किया हुआ है।
28दिन-रात वह प्रभु की भक्ति करती हैं और भक्ति करने से वह रुकती नहीं।
29परमेश्वर के मन्दिर में उनका निवास है और प्रभु के नाम से वह संवरी हुई हैं।
30वह विनीत होकर सच्चे हृदय से प्रार्थना करती हैं।
31वह अपने स्वामी के पास सुन्दर लगती हैं और पति-प्रभु के हुक्म में उसके पास पहुँची हैं।
32वह प्रभु को श्रद्धा से प्रेम करती है। वे सभी सखियां प्रभु के समक्ष प्रार्थना करती हैं।
33प्रभु-नाम के बिना मनुष्य का जीवन धिक्कार-योग्य है और उसका निवास भी धिक्कार योग्य है।
34जो जीव-स्त्री नाम द्वारा संवर गई है उसने ही नाम रूपी अमृत पान कर लिया है॥ २२॥
35श्लोक महला १ ॥
36जैसे मरुस्थल वर्षा से तृप्त नहीं होता वैसे ही अग्नि की भूख लकड़ियों से दूर नहीं होती।
37कोई भी सम्राट साम्राज्य से तृप्त नहीं होता और सागर को कभी कोई नहीं भर सका।
38हे नानक ! भक्तजनों को सत्य नाम की कितनी भूख लगी रहती है, वह बताई नहीं जा सकती अर्थात् भक्त नाम जप-जप कर तृप्त ही नहीं होते॥१॥
39महला २॥
40जब तक इन्सान को परमेश्वर का ज्ञान नहीं होता उसका जीवन व्यर्थ है।
41गुरु की कृपा से विरले पुरुष ही संसार सागर से पार होते हैं।
42नानक विचार कर कहते हैं कि परमेश्वर सब कार्य करने में समर्थ है।
43जगत् का कारण सृजनहार प्रभु के वश में है और प्रभु की कला ने इस जगत् को धारण किया हुआ है॥ २॥
44पउड़ी॥
45भाट (यशोगान करने वाला) प्रभु के दरबार में वास करता है।
46सत्यस्वरूप परमेश्वर की महिमा गायन करने से उसका हृदय कमल प्रफुल्लित हो गया है।
47ईश्वर से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने से अपने हृदय में वह परम प्रसन्न हो गया है।
48उसने अपने ह्रदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार इत्यादिशत्रुओं को मार कर बाहर निकाल दिया है और उसके सज्जन-सत्य, संतोष, दया एवं धर्म इत्यादि प्रसन्न हो गए हैं।
49सच्चे सतिगुरु ने उसे प्रभु-मिलन का सन्मार्ग बता दिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं