सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 147 · Raag Maajh · Guru Angad Dev Ji

1जो व्यक्ति सत्य-नाम का परवाना लेकर जाता है, उसे आत्मस्वरूप में जाने से कोई भी रोक नहीं सकता।

2जो व्यक्ति भगवान के सत्यनाम को सुनता, समझता एवं उसे जपता है, वह आत्म-स्वरूप में निमंत्रित कर लिया जाता है॥१८॥

3श्लोक महला १॥

4यदि मैं अग्नि की पोशाक धारण कर लूं, हिम में अपना घर बना लूं और लोहे को अपना आहार बना लूं,

5समस्त दुखों को यदि मैं जल की भाँति पान कर लूं और धरती को पशुओं की भाँति हॉक कर चलाऊँ।

6आकाश को तराजू में रखकर तोलूं और यदि मैं दूसरी ओर चार माशे के तोल से तोलूं,

7यदि मैं अपने शरीर को इतना बड़ा कर लूं कि कहीं भी समा न सकूं और यदि मैं समस्त जीवों के नाक में नुकेल डालकर अपने हुक्म में चलाता रहूँ,

8यदि मेरे मन में इतना बल हो कि इस तरह की बातें मैं करूँ और अपने कथन से दूसरों से भी कराऊँ पर यह सब कुछ व्यर्थ है।

9जितना महान परमेश्वर है उतने महान ही उसके दान हैं। वह अपनी इच्छानुसार जीवों को दान देता है।

10हे नानक ! जिस पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उसको सत्य नाम की महानता प्राप्त होती है ॥ १ ॥

11महला २॥

12इन्सान का मुँह बातें कह-कह कर तृप्त नहीं होता, उसके कान बातें अथवा संगीत सुन-सुनकर संतुष्ट नहीं होते

13और उसकी आँखें सुन्दर रूप देख-देखकर तृप्त नहीं होती। प्रत्येक अंग एक प्रकार की विशेषता का ग्राहक है।

14भूखों की भूख निवृत्त नहीं होती। मौखिक बातों से भूख दूर नहीं होती।

15हे नानक ! भूखा मनुष्य तभी तृप्त होता है यदि वह गुणों के भण्डार परमात्मा की महिमा करके उसमें समा जाता है॥ २ ॥

16पउड़ी ॥

17सत्य नाम के अलावा सभी कार्य झूठे हैं और झूठ का ही कर्म करते हैं।

18सत्यनाम के सिवाय अन्य झूठे कार्य करने वाले लोगों को यमदूत बांधकर यमपुरी ले जाते हैं।

19सत्य नाम के अलावा यह तन मिट्टी समान है और मिट्टी में ही मिल जाता है।

20सत्यनाम के सिवाय मनुष्य जितना बढ़िया पहनता एवं खाता है, उससे उसकी भूख में ही वृद्धि होती है।

21मनुष्य सत्य नाम के बिना झूठे कार्य करके प्रभु के दरबार को प्राप्त नहीं कर सकता।

22सच्चे परमात्मा के अलावा झूठे लोग ईश्वर के मन्दिरको प्राप्त नहीं होते। झूठे लोभ से सम्मिलित होकर मनुष्य प्रभु के मन्दिर को गंवा देता है।

23सारा जगत् घोखेबाज माया ने छल लिया है और प्राणी योनियों में फँसकर जन्म लेता और मरता रहता है।

24प्राणी के तन में तृष्णा की अग्नि विद्यमान है। यह प्रभु के नाम से ही बुझाई जा सकती है॥ १९ ॥

25श्लोक महला १॥

26हे नानक ! गुरु संतोष रूपी वृक्ष है, इस वृक्ष को धर्म रूपी फूल लगता है और ज्ञान रूपी फल लगते हैं।

27हरि-रस रूपी जल से सीचा हुआ यह वृक्ष सदैव ही हरा-भरा रहता है। भगवान की कृपा से ध्यान द्वारा यह ज्ञान रूपी फल पकते हैं।

28इस ज्ञान रूपी फल को खाने वाला मनुष्य पति-प्रभु के मिलाप के आनंद को प्राप्त करता है। ज्ञान रूपी दान ही समस्त दानों में से बड़ा दान है॥ १॥

29महला १॥

30गुरु सोने का वृक्ष है, जिसके पते मूंगे हैं और इसके पुष्प जवाहर एवं माणिक हैं।

31उस पौधे को गुरु के मुखारबिंद के वचन की मणि का फल लगा हुआ है। जो व्यक्ति गुरु के वचनों को अपने हृदय में बसा लेता है, वह कृतार्थ हो जाता है।

32हे नानक ! गुरु के शब्द रूपी फल उस व्यक्ति के मुंह में ही पड़ते हैं, जिस पर भगवान की कृपा होती है और उसके माथे पर तकदीर का शुभ लेख लिखा होता है।

33गुरु के चरणों में आने से अठसठ तीर्थों के स्नान से भी अधिक फल मिलता है। अतः हमेशा ही गुरु के चरणों की पूजा करनी चाहिए।

34हे नानक ! हिंसा, मोह, लालच एवं क्रोध यह चारों ही अग्नि की नदियाँ हैं।

35इनमें पड़ने से प्राणी जल जाता है। इन नदियों में से वहीं मनुष्य पार होते हैं जो भगवान की कृपा से नाम-सिमरन में लग जाते हैं।॥ २॥

36पउड़ी ॥

37जीवित ही मर जाओ अर्थात् अपने अहंकार को नष्ट कर दो । अहंकार को नष्ट करने के उपरांत पश्चाताप नहीं होगा।

38यह दुनिया झूठी है, परन्तु किसी विरले ने ही यह बात गुरु से समझी है।

39मनुष्य सत्यनाम से प्रेम नहीं करता और दुनिया के धंधों में लगकर भटकता रहता है।

40यम बहुत निर्दयी है और जीवों का नाश करने वाला है। यह दुनिया के लोगों पर सवार है।

41ईश्वर के आदेश से यमदूत अवसर पाकर मनुष्य के सिर पर डण्डा मारता है।

42परमेश्वर स्वयं ही अपना प्रेम प्रदान करता है और इसे प्राणी के मन में वास कराता है।

43मनुष्य का शरीर त्यागने में मुहूर्त अथवा क्षण भर का विलम्ब नहीं होता।

44गुरु की कृपा से इस भेद को समझ कर प्राणी सत्य में ही समा जाता है।॥ २०॥

45श्लोक महला १॥

46उस व्यक्ति के मन एवं मुंह में तुंधी, विष, आक, धतूरा एवं नीम फल जैसी कड़वाहट बनी रहती है,

47हे प्रभु ! जिस व्यक्ति को तू हृदय में याद नहीं आता,

48हे नानक ! ऐसे भाग्यहीन व्यक्ति भटकते रहते हैं और उनकी दुखद दशा किसे बताई जाए॥ १॥

49महला १ ॥

50आदमी की मति एक पक्षी है। आदमी की किस्मत उस पक्षी के पंख हैं जो उसके साथ रहते हैं। यह पक्षी पंखों से उड़कर कभी उत्तम एवं कभी नीच स्थानों पर बैठता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं