गुरु ग्रंथ साहिब 146 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1तीसरे प्रहर में जब भूख और प्यास रूपी दोनों कुते भौंकने लग जाते हैं तो मनुष्य को उनके मुँह में भोजन एवं पानी डालना पड़ता है,
2जब पहला भोजन का ग्रास हजम हो जाता है तो और भोजन खाने की लालसा उत्पन्न होती है।
3चौथे प्रहर में मनुष्य को निंद्रा आ जाती है, वह अपने नेत्र बन्द कर लेता है और स्वप्न मण्डलों में चला जाता है।
4फिर निंद्रा से उठकर, वह पुनः विवाद खड़ा कर देता है और यूं अखाड़ा बनता है, जिस तरह उसने सैकड़ों वर्ष जीना है।
5यद्यपि मनुष्य के मन में आठों प्रहर परमात्मा का भय बना रहे तो उसके लिए सभी वक्त नाम-सिमरन हेतु शुभ हैं।
6हे नानक ! यदि भगवान मनुष्य के हृदय में निवास कर ले तो उसका यह सच्चा स्नान हो जाता है॥ १ ॥
7महला २॥
8वही व्यक्ति पूर्ण शाह हैं, जिन्होंने पूर्ण प्रभु को पा लिया है।
9वह दुनिया से बेपरवाह होकर आठों प्रहर एक परमेश्वर के प्रेम में मग्न रहते हैं।
10ऐसे विरले पुरुष हैं जो अनंत परमात्मा के दर्शन प्राप्त करते हैं।
11बड़ी तकदीर से ही पूर्ण गुरु मिलता है, जिस गुरु के सारे ही किए वचन पूर्ण होते हैं।
12हे नानक ! यदि गुरु जी किसी सेवक को सम्पूर्ण बना दें तो उसका विवेक कम नहीं होता॥ २ ॥
13पउड़ी ॥
14हे मेरे प्रभु ! मैं सत्य कहता हूँ जब तुम मेरे हो, तो मुझे शेष और क्या चाहिए ?
15जिस जीव-स्त्री को लौकिक कार्यो रूपी चोरों ने लूट लिया है, वह प्रभु के आत्म-स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकती।
16उसने अपने निष्ठुर हृदय के कारण सेवा-भक्ति का अवसर गंवा दिया है।
17जिसके हृदय में सत्यस्वरूप परमात्मा का निवास नहीं होता। उसको नष्ट करके नए तरीके से बनाया जाता है। अर्थात् उसका जन्म-मरण होता रहता है।
18ऐसा व्यक्ति अपने कर्मों का लेखा देते वक्त पूरे माप सहित तोलने से कैसे पूरा तोला जाएगा?
19यदि जीव का अहंकार दूर हो जाए तो उसके कर्मों के तोल को कोई भी कम नहीं कहेगा।
20सभी जीव चतुर प्रभु के दरबार पर परखे जाते हैं कि वह धर्मात्मा है अथवा पापी हैं।
21नाम का सौदा एक सत्संग रूपी दुकान से ही मिलता है। यह पूर्ण गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है॥ १७ ॥
22श्लोक महला २॥
23दिन-रात के वक्त को आठ भागों में विभक्त किया हुआ है, जिन्हें आठ प्रहर कहा जाता है। एक प्रहर तीन घण्टों का होता है। इन आठों प्रहरों में से एक प्रहर का संबंध शरीर से है। (इस प्रहर को अगली तुकों में प्रातः काल का चतुर्थ प्रहर कहा गया है। )
24उस शरीर में अद्वितीय परमात्मा के नाम की नवनिधि है। भले और गंभीर पुरुष उन निधियों को ढूंढते हैं।
25हे नानक ! भाग्यशाली मनुष्य गुरु अथवा पीर धारण करके भगवान की महिमा गायन करते हैं।
26दिन के चौथे प्रहर प्रातः काल नाम में वृत्ति लगाने वाले व्यक्तियों के मन में उत्साह उत्पन्न होता है।
27उनकी मित्रता नदियोंसे होती है अर्थात् सत्संग रूपी नदिया पर जाकर स्नान है और उनके मन एवं मुख में सत्य नाम विद्यमान है।
28उस सत्संग में अमृत रूप ईश्वर का नाम बांटा जाता है और भाग्यशालियों को नाम की देन प्राप्त होती है।
29उनके सोने जैसे अर्थात् शुद्ध तन को जब नाम रूपी कसौटी लगाई जाती है तो उनके तन को भक्ति का सुन्दर रंग चढ़ जाता है।
30जब सतिगुरु रूपी सर्राफ की उन पर कृपा-दृष्टि हो जाती है तो उन्हें जन्म-मरण रूपी कष्ट नहीं मिलता।
31शेष सातों प्रहरों में सत्य बोलना एवं विद्वानों के पास बैठना अति उत्तम है।
32वहाँ पाप एवं पुण्य की पहचान होती है और झूठ की पूँजी कम होती है।
33वहाँ खोटे पुरुष दूर फेंके जाते हैं और भले पुरुषों को शाबाशी मिलती है।
34हे नानक ! जीवों को दुःख एवं सुख भगवान स्वयं ही देता है और मनुष्य का किसी प्रकार का शिकवा करना व्यर्थ है॥ १॥
35महला २॥
36सारी दुनिया का गुरु पवन है, जल पिता है और पृथ्वी बड़ी माता है।
37दिन एवं रात्रि दोनों उपपिता एवं उपमाता है, जिनकी गोद में सारी दुनिया खेल रही है।
38परलोक में भगवान के समक्ष यमराज जीवों के शुभ-अशुभ कर्मों का विवेचन करता है।
39अपने-अपने कर्मों के अनुसार कुछ जीव ईश्वर के निकट एवं कुछ जीव दूर होते हैं।
40जिन्होंने भगवान का नाम-सिमरन किया है, वे पूजा-तपस्या इत्यादि की मेहनत को साकार कर गए हैं।
41हे नानक ! ऐसे प्राणियों के चेहरे उज्ज्वल हुए हैं और अनेकों ही उनके साथ वाले मुक्ति प्राप्त कर गए हैं।॥ २॥
42पउड़ी ॥
43सतिगुरु ने जिस व्यक्ति को यह ज्ञान बता दिया है कि भगवान का प्रेम ही खाने योग्य सत्य-भोजन है,
44वही व्यक्ति सत्य प्रभु में निष्ठावान हुआ है और सत्य में समाकर फूल की तरह खिल गया है।
45उसके गांव रूपी शरीर में जो भगवान का आत्मस्वरूप रूपी किला है, वहाँ स्थित हो गया है।
46सतिगुरु ने प्रसन्न होकर उसे नाम प्रदान किया है और वह भगवान के प्रेम से कृतार्थ हो गया है।
47कोई भी व्यक्ति सत्य के दरबार में झूठ की कमाई करके नहीं जा सकता।
48जो व्यक्ति केवल झूठ ही बोलता रहता है, वह आत्मस्वरूप में नहीं जा सकता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं