गुरु ग्रंथ साहिब 145 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1जब तुझे अच्छा लगता है तो प्राणी अपने शरीर पर विभूति मलता है और सिंगी नाद बजाता है।
2जब तुझे अच्छा लगता है तो मनुष्य कुरान पढ़ता है और मुल्लां और शेख कहलाया जाता है।
3हे नाथ ! जब तेरी इच्छा होती है, तो कई राजा बन जाते हैं और अधिकतर स्वादों का आनंद लेते हैं।
4हे ठाकुर ! जब तुझे उपयुक्त लगता है तो मनुष्य तलवार चलाते हैं और शीश को धड़ से काट फॅफते हैं।
5हे स्वामी ! जब तेरी इच्छा होती है तो लोग देश-देशांतरों में जाते हैं और अनेकों सूचनाएँ श्रवण करके घर लौट आते हैं।
6हे प्राणपति ! जब तुझे उपयुक्त लगता है, तो मनुष्य तेरे नाम में लीन हो जाता है और जब तेरी इच्छा होती है, वह तुझे अच्छा लगने लग जाता है।
7नानक एक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! तेरी इच्छा में चलने वालों के अलावा शेष सभी जीव झूठ ही कमाते हैं।॥ १॥
8महला १॥
9हे ईश्वर ! जब तू महान है, तो सारी महानता तुझ से ही प्रकट होती है। तुम स्वयं भले हो और तुझसे भला ही होना है।
10जब तू स्वयं सत्य है तो जो तेरी पूजा करते हैं वह सभी सत्यवादी बन जाते हैं। तेरे सच्चे भक्त को कोई भी मनुष्य झूठा दिखाई नहीं देता।
11जीवों का कहना, देखना, बोलना, चलना, जीना एवं मरना इत्यादि यह तेरी माया खेल ही है।
12हे नानक ! सत्यस्वरूप परमात्मा स्वयं ही अपने हुक्म द्वारा सृष्टि रचना करता है और अपने हुक्म में ही समस्त प्राणियों को रखता है॥ २॥
13पउड़ी॥
14यदि हम सतिगुरु की निष्काम सेवा करें तो भ्रम दूर हो जाते है।
15हमें वहीं कार्य करना चाहिए जो सतिगुरु करने के लिए कहते हैं।
16यदि सतिगुरु जी दयालु हो जाएँ, तो ही हम नाम सिमरन कर सकते हैं।
17भक्ति पूजा का लाभ उत्कृष्ट है। यह गुरुमुख द्वारा प्राप्त किया जाता है।
18मनमुख व्यक्ति के लिए अज्ञानता का अँधेरा बना रहता और वे झूठे धन की ही कमाई करते रहते हैं।
19जो व्यक्ति सत्य के दर सत्य प्रभु का नाम-सिमरन करता है,
20ऐसे सत्यवादी को सत्य प्रभु के आत्मस्वरूप में बुला लिया जाता है।
21हे नानक ! जो व्यक्ति हमेशा ही सत्य-नाम का सिमरन करता रहता है, वहीं सत्यवादी है और वह सत्य में ही समा जाता है॥ १५ ॥
22श्लोक महला १॥
23कलियुग छुरी है और बादशाह कसाई है। धर्म पंख लगाकर दुनिया में से उड़ गया है अर्थात् कलियुग में धर्म का नाश हो गया है।
24झूठ की इस अमावस्या की रात्रि में सत्य का चाँद कहीं उदय हुआ दिखाई नहीं देता अर्थात हर तरफ झूठ ही विद्यमान है और सत्य का नाश हो गया है।
25मैं सत्य की खोज-तलाश करती हुई पागल हो गई हूँ, इस अंधेरे में, मुझे रास्ता नहीं मिल रहा है।
26सारी दुनिया ही झूठ के अंधेरे में अहंकारवश दुखी होकर विलाप कर रही है।
27हे नानक ! इस झूठ से किस विधि द्वारा जीवों की मुक्ति होगी ? ॥ १॥
28महला ३॥
29कलियुग में भगवान की महिमा दुनिया में ज्ञान रूपी प्रकाश प्रगट कर देती है।
30कोई विरला गुरमुख ही भवसागर को तर कर पार होता है।
31हे नानक ! जिस व्यक्ति पर भगवान अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उसे ही अपनी महिमा की देन प्रदान करता है
32किन्तु गुरमुख ही नाम रूपी रत्न प्राप्त करता है॥ २ ॥
33पउड़ी॥
34भगवान के भक्तों एवं दुनिया के जीवों में मिलाप कभी भी योग्य नहीं बना।
35भगवान स्वयं अचूक है। वह किसी दूसरे के भुलाने से भी भूल नहीं करता।
36जिन्होंने सत्यवादी बनकर सत्य की ही साधना की है ऐसे भक्तों को भगवान ने स्वयं ही अपने साथ मिलाया हुआ है।
37जिन लोगों ने झूठ बोल-बोलकर माया रूपी विष खाया है, ऐसे लोगों को भगवान ने स्वयं ही कुमार्गगामी कर दिया हैं।
38वे परम वास्तविकता को नहीं पहचानते हैं, कि हम सभी एक दिन इस दुनिया से जाएंगे; वे काम और क्रोध के जहर पैदा करना जारी रखते हैं।
39जिन्होंने दिन-रात नाम का ही ध्यान किया है, ऐसे भक्तजन ही भगवान की भक्ति एवं सेवा करते रहते हैं।
40जिन्होंने प्रभु के दासों के दास बनकर अपने अन्तर्मन से अहंकार को मिटा दिया है,
41मालिक-प्रभु के दरबार में उनके ही मुख उज्ज्वल होते हैं और वे सत्य नाम द्वारा सत्य के दरबार में बड़ी शोभा प्राप्त करते हैं॥ १६ ॥
42श्लोक महला १ ॥
43जो व्यक्ति प्रातः काल एकाग्रचित होकर ईश्वर का यश करते और उसे स्मरण करते हैं,
44वही पूर्ण सम्राट हैं और सही वक्त पर लड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं।
45दूसरे प्रहर में मन की वृति विखर जाती है और मन अनेक मागों पर दौड़ता है।
46मनुष्य बहुत सारे धंधों के झंझटों रूपी अथाह सागर में गिर जाता है और ऐसे गोते खाता है कि उसमें से बाहर निकल ही नहीं सकता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं