गुरु ग्रंथ साहिब 144 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1हे ईश्वर ! एक तेरे सिवाय दूसरा कोई भी सदैव स्थिर नहीं है। तीनों कालों में एक तू ही सदैव सत्य है॥ २॥
2महला १ ॥
3जगत् में न धरती के उपरोक्त आकाश के सप्त लोक स्थिर हैं, जहाँ मनुष्यों के कर्मो का न्याय करने वाले देवते रहते हैं, न जमीन के नीचे सात पाताल के लोग स्थिर हैं, जहाँ दैत्य रहते हैं।
4सभी क्षणभंगुर हैं। हे प्रभु ! एक तेरे सिवाय दूसरा कोई भी अमर नहीं है।
5एक तुम ही हो, आदि में भी तुम ही हो और अन्त में भी तुम ही हो॥ ३॥
6महला १॥
7न सूर्यमण्डल, न चंद्र मण्डल, न ही सप्त द्वीप, न ही सागर, न ही अनाज और हवा कोई भी स्थिर नहीं।
8हे प्रभु! केवल तुम ही हो, तीनों कालों में एक तुम ही हो।॥ ४॥
9महला १ ॥
10जगत् के समस्त जीवों का भोजन पदार्थ उस प्रभु के सिवाय किसी अन्य के वश में नहीं है।
11हम सबको एक प्रभु की ही आशा है।
12शेष सब क्षणभंगुर है। हे प्रभु ! एक तेरे सिवाय अन्य कोई दूसरा सदैव स्थिर नहीं है।
13तीनों कालों में केवल तुम ही हो॥ ५॥
14महला १॥
15परिंदो के न अपने घर हैं और न ही उनके पास धन है।
16वह जीने के लिए जल एवं वृक्षों में अपनी आशा रखते हैं।
17उन्हें भी आहार देने वाला एक प्रभु ही है।
18हे प्रभु! तीनों कालों में तुम ही हो। एक तू ही अटल है॥ ६ ॥
19महला १॥
20हे नानक ! इन्सान के माथे पर जो तकदीर के लेख परमात्मा ने लिख दिए हैं,
21उन्हें कोई भी मिटा नहीं सकता।
22हे प्रभु ! एक तू ही जीवों में प्राण-कला को धारण करते हो, तुम ही उसे वापिस निकाल लेते हो।
23हे ठाकुर ! तीनों कालों में तुम ही हो। एक तू ही अनश्वर है॥ ७॥
24पउड़ी॥
25हे भगवान ! तेरा हुक्म सदैव सत्य है और इसे गुरु द्वारा ही जाना जा सकता है।
26जो व्यक्ति गुरु के उपदेश द्वारा अपने अहंत्व को त्याग देता है, वह भगवान को पहचान लेता है।
27हे प्रभु ! तेरा दरबार सत्य है और तेरा शब्द तेरे दरबार में जाने हेतु निशान है।
28जो व्यक्ति सत्य-नाम का चिंतन करता है, वह सत्य में ही समा जाता है।
29मनमुख सदैव झूठे हैं और भ्रम में पड़कर भटके हुए हैं।
30मरणोपरांत उनका निवास विष्टा में ही होता है क्योंकि अपने जीवन में कभी भी नाम के स्वाद को जाना नहीं होता अर्थात् उन्होंने कभी भी नाम-सिमरन नहीं किया होता।
31नाम के बिना वे बहुत दु:खी होते हैं। वे योनियों के चक्र में फँस कर जन्मते-मरते रहते हैं।
32हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही पारखी है, वह पापी एवं धर्मी की पहचान कर लेता है ॥१३ ॥
33श्लोक महला १॥
34यदि भगवान की इच्छा हो तो वह शेरों, बाजों, चीलों तथा कुईयों इत्यादि मॉसाहारी पशु-पक्षियों को घास खिला देता है।
35जो घास खाने वाले पशु हैं, उनको वह माँस खिला देता है। वह जीवों को ऐसे मार्ग पर चला देता है।
36वह नदियों में टीले बनाकर दिखा देता है और रेगिस्तान में गहरा सागर बना देता है।
37वह चाहे तो तुच्छ जीव को भी साम्राज्य सौंप देता है और राजाओं की सशक्त सेना का वध करके राख बना देता है।
38जगत् में जितने भी जीव हैं वे सभी श्वास लेकर जीते हैं अर्थात् श्वासों के बिना जीवित नहीं रह सकते परन्तु यदि परमात्मा की इच्छा हो तो उन्हें श्वासों के बिना भी जीवित रख सकता है।
39हे नानक ! जिस तरह सत्य प्रभु को अच्छा लगता है, वैसे ही वह जीवों को आहार देता है। १॥
40महला १॥
41कई जीव मॉसाहारी हैं, कई जीव घास खाते हैं,
42कई जीव छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते है जैसे मनुष्य।
43कई जीव मिट्टी में ही रहते हैं और मिट्टी ही खाते हैं।
44कई जीव पवन आहारी गिने जाते हैं।
45कई जीव निरंकार के पुजारी हैं और उन्हें नाम का ही आधार है।
46जीवनदाता प्रभु सदैव जीवित है। कोई भी जीवभूखा नहीं मरता क्योंकि प्रभु सबको आहार देता है।
47हे नानक ! जो उस परमेश्वर को अपने हृदय में नहीं बसाते, वे मोह-माया के हाथों ठगे जाते हैं॥ २ ॥
48पउड़ी ॥
49भाग्य से ही पूर्ण गुरु की सेवा की जाती है।
50गुरु की मति द्वारा हमें अपने अहंत्व को मिटाकर भगवान के नाम का ध्यान करते रहना चाहिए।
51धन-दौलत कमाने के कार्य में लगकर हम अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं।
52नाम के सिवाय हमारा वस्त्र पहनना एवं भोजन ग्रहण करना सब कुछ ही विष खाने के समान है।
53अतः सत्यनाम की महिमा- स्तुति करने से ही सत्य में समाया जा सकता है।
54सतिगुरु की सेवा किए बिना मनुष्य का सुख में निवास नहीं होता और वह बार-बार जन्मता एवं मरता है।
55झुठे संसार में प्राणी झूठे कर्म करता रहता है।
56हे नानक ! निर्मल सत्य नाम का यशोगान करने से मनुष्य सत्य के दरबार में सम्मानपूर्वक संसार से जाता है॥ १४॥
57श्लोक महला १॥
58हे भगवान ! जब तुझे अच्छा लगता है तो मनुष्य संगीतमय बाजे बजाता और गाता है। जब तेरी इच्छा होती है तो वह जल में स्नान करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं