गुरु ग्रंथ साहिब 143 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1बेलनों के बीच रखकर मलकर अथवा पहलवानों के समान जो पुरुष हैं वह इसको दबाते और दण्ड देते हैं।
2उसका रस खींचकर कड़ाहे में डाला जाता है और यह जलता हुआ चीखता-चिल्लाता है।
3गन्ने की खोई भी जिसका रस निकाल लिया है उसे भी इकठ्ठा करके अग्नि में जला दिया जाता है।
4हे नानक ! मीठे पत्तों वाले गन्ने से किस तरह का व्यवहार हुआ है, हे प्राणियों ! आकर देखो॥ २॥
5पउड़ी॥
6कुछ लोगों को मृत्यु स्मरण नहीं, उनके मन में दुनिया के सुख भोगने की अधिक आशा होती है।
7वह हमेशा जन्मते-मरते रहते हैं तथा किसी के भी सच्चे मित्र नहीं बनते।
8वह अपने मन ही मन में अपने आपको भला कहते हैं।
9यमराज हमेशा इन मनमुखों को समाप्त करने के लिए देखता रहता है।
10मनमुख नमक खाकर हराम करने वाला है और अपने ऊपर किए हुए परमेश्वर के उपकार का धन्यवादी नहीं होता।
11जो दबाव अधीन प्रणाम करते हैं वह प्रभु को अच्छे नहीं लगते।
12जो मुख से सत्यनाम बोलते हैं वह ईश्वर के मन को अच्छे लगने लग जाते हैं
13वे भगवान की पूजा करते हैं और उसके सिंहासन पर झुकते हैं। वे अपनी पूर्वनिर्धारित नियति को पूरा करते हैं।॥११॥
14महला १ शलोक॥
15मछली को गहरे जल का क्या लाभ है, यदि वह उसे मछेरे से नहीं बचा सकता? खुले आकाश का पक्षी को क्या लाभ है, यदि वह उसे शिकारी से नहीं बचा सकता ?
16पत्थर को शीत का क्या लाभ है, जब उस पर सर्दी का कोई प्रभाव ही नहीं होता ? नपुंसक को विवाह करवाने का क्या लाभ है, यदि वह दुल्हन से भोग का आनंद ही नहीं ले सकता ?
17यदि कुत्ते को चंदन लगा दिया जाए तो फिर भी उसका कुत्ते वाला स्वभाव ही रहेगा और कुतिया की ओर ही दौड़ेगा।
18यदि बहरे मनुष्य को स्मृतियों का पाठ पढ़कर सुनाए तो भी वह सुनकर समझता नहीं।
19यदि अंधे मनुष्य के समक्ष पचास दीपकों का प्रकाश भी कर दिया जाए तो भी उसे कुछ भी दिखाई नहीं देगा।
20मनुष्य चाहे गाय एवं भैसों के समूह के पास सोना रख दे तो भी वह घास को ही चुन-चुनकर खाएँगे।
21लोहे को कपास के समान लकड़ी के साथ झाड़ें तो भी वह नरम नहीं होता।
22हे नानक ! मूर्ख मनुष्य में यही गुण होते हैं कि वह जो कुछ भी बोलता है, उससे उसका अपना ही विनाश होता है॥ १॥
23महला १ ॥
24जब कांस्य, सोना एवं लोहा टूट जाए
25तो सुनार अग्नि से गांठ लगा देता है।
26यदि पत्नी के साथ पति नाराज़ हो जाए तो
27पुत्र के द्वारा जगत् में पुनः संबंध कायम हो जाते हैं।
28राजा अपनी प्रजा से कर माँगता है और उसे कर देने से प्रजा का राजा से संबंध बना रहता है।
29भूखे लोगों का दानी सज्जनों से संबंध बन जाता है क्योंकि वे उनसे मॉगकर भोजन खाते रहते हैं।
30अकाल पड़ने से लोगों का नदियों से संबंध तब बनता है, जब बर्षा होने पर उनमें से बहुत जल मिलने लगता है।
31प्रेम व मधुर वचनों का मेलजोल है।
32यदि कोई सत्य बोले तो उसका संबंध वेदों से हो जाता है।
33जो व्यक्ति अपने जीवन में भलाई करते हैं और दान देते हैं, मरणोपरांत उनका संबंध दुनिया से बना रहता है।
34इस तरह का मेल-मिलाप इस संसार में प्रचलित है।
35मूर्ख के सुधार का हल केवल यही है कि वह मुँह की मार खाए।
36नानक एक ज्ञान की बात कहता है कि
37भगवान की महिमा-स्तुति करने से मनुष्य का उसके दरबार से संबंध कायम हो जाता है॥ २॥
38पउड़ी॥
39परमेश्वर स्वयं ही सृष्टि की रचना करके स्वयं ही विचार करता है।
40कई जीव दुष्ट हैं और कई जीव धर्मात्मा हैं। इन दुष्ट एवं धर्मी जीवों की जाँच भगवान स्वयं ही करता है।
41जैसे खजानची शुद्ध सिक्कों को खजाने में डाल देता है और खोटे सिक्कों को खजाने से बाहर फेंक देता है,
42वैसे ही पापियों को प्रभु के दरबार में से बाहर फेंक दिया जाता है। वे पापी जीव किसके समक्ष विनती कर सकते हैं।
43वह दौड़कर सतिगुरु की शरण में आएँ, यही कर्म श्रेष्ठ है।
44सतिगुरु पापियों को पवित्र बना देता है। वह पापी मनुष्य को प्रभु के नाम से सुशोभित करने वाला है।
45गुरु के साथ प्रेम एवं स्नेह करने से प्राणी सत्य दरबार में प्रशंसा के पात्र हो जाते हैं।
46जिन्हें सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने स्वयं क्षमा कर दिया है, उनके कर्मों का कौन मूल्यांकन कर सकता है॥ १२॥
47श्लोक महला १ ॥
48पीर, शेख एवं राजा इत्यादि सभी दुनिया के लोग जमीन में दफन कर दिए जाते हैं।
49बादशाह भी अंत में दुनिया से चले जाते हैं। केवल एक खुदा ही सदैव विद्यमान है।
50हे अल्लाह ! एक तू ही हैं और तू ही इस दुनिया में हमेशा रहने वाला है।
51महला १॥
52धरती पर सदैव रहने वाले न देवता हैं, न दैत्य हैं, न ही मनुष्य हैं, न ही सिद्ध एवं साधक हैं।
53यह सभी क्षणभंगुर हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं