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गुरु ग्रंथ साहिब 142 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji

1यदि हीरे एवं जवाहरों से जड़ित सोने एवं चांदी का पर्वत भी मुझे मिल जाए,

2मैं फिर भी तेरा ही यशोगान करूँगा और तेरी महिमा करने की मेरी उमंग खत्म नहीं होगी॥ १॥

3महला १॥

4हे प्रभु ! यदि मेरे लिए अठारह भार वाली सारी वनस्पति मेवा बन जाए, जिसका स्वाद गुड़ जैसा मीठा हो,

5यदि मेरा निवास स्थान अटल हो जाए, जिसके आस-पास सूर्य एवं चंद्रमा दोनों ही घूमते रहें,

6फिर भी मैं तेरा ही यश करूँगा और तेरा यश करने का मेरा चाव हृदय से नहीं हटेगा ॥ २ ॥

7महला १॥

8हे भगवान ! यदि मेरे शरीर को दुख लग जाए और दोनों पापी ग्रह राहु-केतु मुझे कष्ट दें।

9यदि रक्तपिपासु राजा मेरे सिर पर शासन करते हों मुझे फिर भी यूं ही लगे कि जैसे तुम मुझे प्रेम करते हो,

10हे ईश्वर ! फिर भी मैं तेरी ही सराहना करूँगा और तेरा यश करने की चाहत खत्म नहीं होगी॥ ३॥

11महला १॥

12यदि मेरे लिए अग्नि एवं शीत मेरा परिधान हो, हवा मेरा भोजन हो

13और यदि स्वर्ग की मोहिनी अप्सराएँ मेरी पत्नियाँ हों, हे नानक ! यह सब पदार्थ क्षणभंगुर हैं।

14हे प्रभु ! तो भी मैं तेरी ही महिमा गायन करूँगा। तेरी महिमा करने की तीव्र लालसा मिटती ही नहीं ॥ ४ ॥

15पउड़ी॥

16जो दुष्कर्मी हैवान है, वह परमात्मा को नहीं जानता।

17यह पागल कहा जाता है जो अपने स्वरूप को नहीं समझता।

18इस संसार में कलह हानिकारक है, क्योंकि वाद-विवाद में मनुष्य व्यर्थ ही पीड़ित हो जाता है।

19हरिनाम के अलावा प्राणी व्यर्थ है और भ्रम-विकारों में वह नष्ट हो जाता है।

20जो दोनों मागों को एक प्रभु की ओर जाते समझता है वह मुक्त हो जाएगा।

21झूठ बोलने वाला नरक में पड़कर जलकर राख हो जाता है।

22यदि मनुष्य सत्य में लीन रहता है तो उसके लिए सारी दुनिया ही सुन्दर है।

23वह अपना अहंकार मिटाकर प्रभु के दरबार में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करने में सफल हो जाता है॥६॥

24महला १ श्लोक॥

25जिसके मन में भगवान का निवास है, उस व्यक्ति को ही जिया समझो।

26हे नानक ! भगवान के नाम बिना किसी को भी जिया नहीं कहा जा सकता,

27वह तो मृतक के समान होता है। यदि वह जीता भी है तो वह जगत् में से अपनी मान-प्रतिष्ठा गंवा कर चला जाता है।

28वह जो कुछ भी खाता है, वह सब हराम बन जाता है।

29किसी व्यक्ति का शासन से प्रेम है और किसी का धन-दौलत से प्रेम है। ऐसा बेशर्म व्यक्ति मिथ्या माया के मोह में मग्न हुआ नग्न नृत्य कर रहा है।

30हे नानक ! वह ठगा और लुटपुट जाता है।

31ईश्वर के नाम के अलावा वह अपनी प्रतिष्ठा गंवा कर चला जाता है॥ १॥

32महला १II

33हे जीव ! स्वादिष्ट भोजन खाने एवं सुन्दर वस्त्र पहनने का क्या अभिप्राय है,

34यदि तेरे मन में उस भगवान का निवास ही नहीं?

35मेवा, धी, मीठा गुड़, मैदा एवं माँस खाने का क्या अभिप्राय है?

36सुन्दर वस्त्र पहनने, सुखदायक शय्या पर विश्राम करने और भोग-विलास का आनंद प्राप्त करने का क्या अभिप्राय है?

37सेना, द्वारपाल, कर्मचारी रखने एवं महलों में निवास करने का क्या अभिप्राय है ?

38हे नानक ! सत्य-परमेश्वर के नाम के सिवाय सभी पदार्थ क्षणभंगुर हैं।॥२॥

39पउड़ी॥

40उच्च जाति वाले के वश में कुछ भी नहीं है, क्योंकि परमात्मा तो जीवों के शुभ-अशुभ कर्मो की ही जाँच करता है। ऊँची जाति का अभिमान विष समान है।

41यदि किसी व्यक्ति के हाथ में विष हो तो वह उस विष को खा कर प्राण त्याग देता है।

42सत्य परमेश्वर की सरकार युग-युग में जानी जाती है।

43जो उसके हुक्म का पालन करता है, वह उसके दरबार में प्रतिष्ठित हो जाता है।

44सत्य प्रभु का यही हुक्म है कि नाम-सिमरन का कर्म करो। इसलिए प्रभु ने मनुष्य को संसार में भेजा है।

45गुरु नगाड़ची ने वाणी द्वारा इस परमेश्वर की आराधना लोगों को सुनाई है।

46इसको श्रवण करके गुरमुख अपने घोड़ों पर सवार हो गए हैं और कई उनको तैयार कर रहे हैं।

47कईओं ने अपना सामान बांध लिया है और कई तो सवार होकर चले भी गए हैं॥ १० ॥

48श्लोक महला १ ॥

49जब अनाज पक जाता है तो किसान उसे काट लेता है। केवल घासफूस और वाड़ रह जाती है।

50अनाज फसल से उतार लिया जाता है और उड़ा कर फसल से दाने अलग कर लिए जाते हैं।

51चक्की के दोनों पाट इकट्टे करके मनुष्य आकर दानों को पीसने बैठ जाते हैं।

52जो केन्द्रीय धुरे से जुड़े रहते हैं, वह बच जाते हैं। हे नानक ! यह एक आश्चर्यजनक बात देखी है॥ १॥

53महला १॥

54देखो कि गन्ना कट जाता है। इसको साफ करके ठोक पीटकर बन्घनों में बांधा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं