गुरु ग्रंथ साहिब 1428 · Salok Mehl 9 · Guru Tegh Bahaadur Ji
1नानक का कथन है कि यह सच्ची बात मान लो कि ईश्वर एवं उसके भक्तों में कोई अन्तर नहीं ॥ २६ ॥
2मन माया में फँसा-रहता है, जिससे ईश्वर का नाम भूल जाता है।
3गुरु नानक निर्देश करते हैं कि भगवान के भजन बिना जीवन किसी काम का नहीं ॥३० ॥
4माया के नशे में अन्धा होकर प्राणी राम को याद नहीं करता।
5हे नानक ! प्रभु-भजन बिना इसके गले में मौत का फंदा ही पड़ता है।॥३१॥
6सुख में तो बहुत सारे साथी बन जाते हैं, परन्तु दुख में कोई साथ नहीं देता।
7गुरु नानक निर्देश करते हैं कि हे मन ! भगवान का भजन कर लो, क्योंकि अंत में वही सहाई होता है॥३२ ॥
8प्राणी बेचारा जन्म-जन्मांतर भटकता रहा, लेकिन उसका मौत का डर नहीं मिटा I
9नानक फुरमाते हैं कि हे मन ! ईश्वर का भजन किया जाए तो निर्भय हो जाओगे ॥३३॥
10मैंने बहुत कोशिशें कर ली हैं, लेकिन मन का अहंकार मिट नहीं सका।
11नानक विनती करते हैं, हे भगवान ! दुर्मति में फँसा हुआ हूँ, मुझे बचा लो॥३४॥
12बचपन, जवानी और बुढ़ापा- जिंदगी की यह तीन अवस्थाएँ मानी जाती हैं।
13नानक का कथन है कि ईश्वर के भजन बिना सब व्यर्थ मान ॥३५ ॥
14जो तुम्हारे करने योग्य काम था, वह (प्रभु-भजन) तूने लालच में फँसकर बिल्कुल नहीं किया।
15गुरु नानक फुरमाते हैं कि हे अन्धे ! समय गुजर गया है, अब क्यों रो रहे हो ॥३६॥
16हे मित्र ! मन तुम्हारा माया में ही लीन है, जो इससे निकलता नहीं।
17नानक का कथन है कि ज्यों दीवार पर रचित मूर्ति दीवार को नहीं छोड़ती, वैसा ही तुम्हारा हाल है॥ ३७ ॥
18इन्सान चाहता तो कुछ और है, लेकिन कुछ और ही हो जाता है।
19हे नानक ! लोगों को धोखा देने की सोच में वह खुद ही फॅस जाता है।॥३८॥
20लोग सुख के लिए बहुत प्रयास करते हैं परन्तु दुख की रोकथाम के लिए कुछ नहीं करते।
21नानक समझाते हैं कि हे मन ! सुन, दरअसल जो ईश्वर को उचित लगता है, वही होता है।॥३६॥
22यह जगत भिखारी की तरह घूमता है, लेकिन सब को देने वाला परमेश्वर ही है।
23नानक का कथन है कि हे मन ! भगवान का सिमरन करने से सब कार्य पूर्ण होते हैं।॥४०॥
24हे भाई ! झूठा अभिमान क्यों कर रहे हो, यह दुनिया सपने की तरह है।
25नानक का यही कथन है कि दुनिया में कुछ भी तेरा नहीं ॥४१॥
26हे मित्र ! शरीर का तुम गर्व करते हो, लेकिन यह तो क्षण में ही नष्ट हो जाता है।
27नानक का मत है कि जो प्राणी ईश्वर का यशोगान करता है, वही जगत पर विजयी होता है॥ ४२ ॥
28जिसके दिल में राम का सिमरन है, उसी व्यक्ति को मुक्त मानो।
29नानक का मत है कि सच मानना, उस व्यक्ति एवं परमात्मा में कोई अन्तर नहीं ॥४३॥
30जिस प्राणी के मन में भगवान की भक्ति नहीं।
31गुरु नानक फुरमान करते हैं कि उसका तन सूअर एवं कुते की तरह मानो ॥४४॥
32ज्यों कुता अपने मालिक का घर हरगिज नहीं छोड़ता।
33नानक का कथन है कि इसी तरह एकाम्रचित होकर दिल से भगवान का भजन करो॥ ४५ ॥
34जो व्यक्ति तीर्थ, व्रत-उपवास एवं दान-पुण्य करके भी मन में गुमान करता है।
35हे नानक ! उसके सब कर्म यों निष्फल हो जाते हैं, ज्यों हाथी स्नान के बाद धूल लगा लेता है॥४६॥
36सिर कॉप रहा है, पैर डगमगा रहे हैं और आँखों की रोशनी भी नहीं रही।
37गुरु नानक का कथन है कि बुढ़ापे में यह दशा हो गई है, इसके बावजूद भी जीव परमात्मा के भजन में लीन नहीं हो रहा॥ ४७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं