गुरु ग्रंथ साहिब 1426 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु नानक फुरमाते हैं- जिसका वह उद्धार करता है, वह उस सृजनहार का स्मरण करता है॥१५॥
2द्वैतभाव का कुमार्ग छोड़कर भगवान से दिल लगाओ।
3हे नानक ! द्वैतभाव में रहने वाले लोग नदिया में बहने वाली चीज़ की तरह हैं॥१६॥
4लोग त्रिगुणात्मक माया के बाजार में जीवन का सौदा करते हैं।
5दरअसल वही सच्चे पंसारी कहलाने के हकदार हैं, जिन्होंने नाम रूपी सच्चा सौदा लाद लिया है॥ १७ ॥
6गंवार जीव-स्त्री प्रेम का रास्ता नहीं जानती और भटकती रहती है।
7हे नानक ! भगवान को भुलाकर वे घोर नरक में पड़ती है॥१८॥
8जीव के मन से धन-दौलत नहीं भूलती, बल्कि ज्यादा से ज्यादा धन ही मांगता है।
9गुरु नानक फुरमान करते हैं कि यदि भाग्य में न हो तो उसे प्रभु याद नहीं आता ॥१६॥
10जब तक ईश्वर कृपा बनी रहती है, तब तक किसी चीज़ की कमी नहीं आती।
11नानक का कथन है कि शब्द-प्रभु अक्षुण्ण भण्डार है, इस धन का स्वेच्छा से खर्च उपयोग किया जा सकता है॥२०॥
12यदि पंख बिक रहे हों तो उनको पर्याप्त मूल्य पर खरीद लूंगा।
13इनको अपने शरीर पर लगाकर अपने प्रभु को ढूंढ लूंगा ॥ २१ ॥
14मेरा सज्जन प्रभु ही सच्चा बादशाह है, वह शाहों से बड़ा शहंशाह है।
15उसके पास बैठते ही शोभा प्राप्त होती है, सब लोगों को उसी का भरोसा है॥२२ ॥
16वह अद्वितीय परब्रह्म जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
17श्लोक महला ६ ॥
18हे भाई ! तुमने गोविन्द का गुणगान नहीं किया, अपना जीवन बेकार ही खो दिया है।
19गुरु नानक निर्देश करते हैं कि हे मन ! परमात्मा का इस तरह भजन करो, जैसे मछली पानी में तल्लीन रहती है॥१॥
20हे भाई ! क्योंकर विषय-विकारों में लीन हो, एक पल भी इनसे तुम अलग नहीं होते।
21गुरु नानक फुरमान करते हैं कि हे मन ! भगवान का भजन कर लो, यम का फंदा नहीं पड़ेगा ॥२॥
22जवानी तो यूं ही चली गई, अब बुढ़ापे ने तन पर कब्जा कर लिया है।
23गुरु नानक निर्देश करते हैं कि हे मन ! ईश्वर का भजन कर ले, समय बीतता जा रहा है॥३ ॥
24बूढ़ा हो गया, कोई होश नहीं, मौत भी सिर पर आ गई है।
25गुरु नानक का कथन है कि हे बावले नर ! अब भी तुम भगवान का भजन क्यों नहीं कर रहे ॥ ४ ॥
26हे भाई ! धन-दौलत, पत्नी एवं पूरी सम्पति को जिसे तुमने अपना मान लिया था।
27नानक की सच्ची बात मान लो कि इनमें से कोई तेरा साथी नहीं ॥ ५ ॥
28ईश्वर पतित जीवों का उद्धार करने वाला है, भयभंजन एवं अनाथों का नाथ है।
29नानक का कथन है कि यह समझ लो कि वह सदैव तुम्हारे साथ रहता है।॥ ६ ॥
30जिस भगवान ने तुझे सुन्दर तन-धन दिया, उससे प्रेम नहीं किया।
31नानक कहते हैं कि हे बावले नर ! अब दीन होकर क्यों दोलायमान हो रहा है॥७ ॥
32जिस परमेश्वर ने शरीर, धन-संपति, सुख-सुविधाएँ और रहने के लिए घर दिया है।
33गुरु नानक समझाते हैं कि हे मन ! उस राम का सिमरन क्यों नहीं करते ॥८॥
34परमात्मा सब सुख देने वाला है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं।
35गुरु नानक निर्देश करते हैं कि हे मन ! उसका सुमिरन (स्मरण) करने से ही मुक्ति होती है।॥६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं