गुरु ग्रंथ साहिब 1424 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Raam Daas Ji
1अमृतमय भगवन्नाम गुरु में ही है, वह नामामृत का कीर्तन करता और जिज्ञासुओं से भी नाम का संकीर्तन करवाता है।
2गुरु का मत है कि परमात्मा का नाम निर्मल सागर है, अतः निर्मल नाम का भजन करो।
3यह अमृत-वाणी गुरु से ही मन में बसती है,
4जिससे हृदय-कमल प्रकाशमय हो जाता है और आत्म-ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है।
5गुरु नानक फुरमान करते हैं सच्चे गुरु से मिलाप उन्हीं का होता है, जिनके ललाट पर भाग्य लिखा होता है ॥२५॥
6स्वेच्छाचारी के अन्तर्मन में तृष्णा की अग्नि लगी रहती है और उसकी वासना दूर नहीं होती।
7परिवार से मोह सब झूठा है, पर वह इस झूठ में ही लिपटा रहता है।
8वह प्रतिदिन चिंता-फिक्र में पड़ा रहता है और संसार की चिंताओं में फंसा रहता है।
9अहंकार में वह अहंकारयुक्त कर्म करता हैं, जिस कारण उसका जन्म-मरण नहीं छूटता।
10गुरु नानक का कथन है कि गुरु की शरण लेने से मनमुखी भी उबर जाता है, गुरु उसे संसार के बन्धनों से छुड़ा देता है ॥२६॥
11गुरु की सत्संगत में श्रद्धा-भाव से परमात्मा का भजन गान होता है।
12जो सत्संगत में गुरु की सेवा करते हैं, गुरु उन्हें परमात्मा से मिला देता है।
13यह संसार भयानक व दुस्तर समुद्र है, गुरु जहाज़ हैं और हरिनाम ही तैराने वाला है।
14गुरु के शिष्यों ने राजा को मान लिया है और पूर्ण गुरु ने उनको पार उतार दिया है।
15हे हरि ! हमें भी गुरु के शिष्यों की चरण-धूलि प्रदान कर दो ताकि हम पापी भी मुक्ति पा लें।
16गुरु नानक फुरमान करते हैं- प्रभु ने जिसके मस्तक पर भाग्य लिखा है, उसे गुरु मिल गया है।
17वह यमदूतों को मारकर भगा देता है और प्रभु-दरबार में बचा लेता है।
18गुरु के शिष्यों को शाबाश है, जिनको परमेश्वर ने प्रसन्न होकर मिला लिया है ॥२७॥
19उस पूर्ण गुरु ने परमात्मा का नाम सुमिरन (स्मरण) करवाया है, जिसने मन में से भ्रमों को दूर कर दिया है ।
20ईश्वर का कीर्तिगान करने से हमें सन्मार्ग दृष्टिगत हुआ।
21अहम् को मारकर हमने एक प्रभु में लगन लगाई है और मन में हरिनाम को बसाया है।
22गुरु-मतानुसार हरिनाम में लीन होने से यम भी बुरी नजर से नहीं देखता।
23सब ईश्वर ही करने वाला है, जब उसे ठीक लगता है, नाम-कीर्तन में लगा देता है।
24गुरु नानक फुरमाते हैं कि हमें तो हरिनाम जप कर जिंदगी मिल रहीं है, अन्यथा हरिनाम बिना तो पल में मर जाते हैं ॥२८॥
25दुष्ट मायावीं पुरुषों के मन में अहंकार का रोग लगा रहता है और अहंकार के कारण भ्रम में भूले रहते हैं।
26गुरु नानक फुरमान करते हैं- जब सतिगुरु, साधु सज्जन से मुलाकात होती है, तो यह रोग दूर हो जाता है ॥२६ ॥
27गुरु की शिक्षा से जीव-स्त्री प्रभु का भजन करती है।
28वह दिन-रात प्रभु के प्रेम में आकर्षित रहती है और प्रभु-रंग में लीन रहती है।
29मैंने पूरे जगत में खोज कर देख लिया है, परन्तु ईश्वर जैसा परम पुरुष कहीं नहीं मिलता।
30गुरु परमात्मा का नाम जपवाता है, फिर मन कहीं भी दोलायमान नहीं होता।
31गुरु नानक फुरमाते हैं कि हम तो हरि के अनन्य भक्त हैं और अपने आप को गुरु-सतगुरु के सेवकों का सेवक मानते हैं ॥३०॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं