गुरु ग्रंथ साहिब 1423 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Raam Daas Ji
1हरिनाम के बिना सब दुख ही हैं और माया-मोह अति दुखदायक है।
2हे नानक ! जब गुरु की कृपा-दृष्टि होती है तो मोह-माया सब दूर हो जाते हैं ॥ १७ ॥
3गुरुमुख हर समय अपने प्रभु के हुक्म को मानता है और उसके हुक्म से ही सुख प्राप्त करता है।
4वह उसके हुक्म का पालन करते हुए सेवा करता है, हुक्म में ही आराधना करता है, वह स्वयं तो हुक्म का पालन करता ही है, अपने संगियों को भी हुक्मानुसार चलने के लिए लगा देता है।
5परमेश्वर का हुक्म मानना ही उसके लिए व्रत-उपवास, नियम, शुद्धता एवं संयम हैं और हुक्मानुसार चलते हुए मनवांछित फल प्राप्त करता है।
6जो जीव-स्त्री प्रभु के हुक्म को समझती है, लगन लाकर सतिगुरु की सेवा करती है, वह सदैव सुहागिन है।
7गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जिन पर ईश्वर अपनी कृपा करता है, उनको अपने हुक्म में मिला लेता है ॥१८॥
8मनमुख पुरुष ईश्वर के हुक्म को नहीं समझता और बेचारा नित्य ही अहंकार में कर्म करता है।
9उसका व्रत-उपवास, नियम, शुद्धता, संयम, पूजा-पाठ इत्यादि पाखण्ड ही साबित होता है, उसका भ्रम बिल्कुल दूर नहीं होता।
10अन्तर्मन उसका माया-मोह ने ऐसे बिंधा होता है, जैसे हाथी अपने ऊपर ही धूल-मिट्टी उड़ाता है।
11जिस परमात्मा ने उत्पन्न किया, उसे याद नहीं करता, फिर उसे याद किए बिना सुख कैसे मिल सकता है।
12गुरु नानक फुरमाते हैं कि दरअसल यह प्रपंच ईश्वर ने ही किया है और पूर्व-कर्मानुसार मनमुख फल पाता है ॥ १६ ॥
13गुरु पर भरोसा हुआ तो मन प्रसन्न हो गया और दिन-रात सेवा में बीत रही है।
14हर कोई मन में गुरु की पूजा करता है और गुरु के दर्शनों के लिए सब आते हैं।
15मैं परम चिंतनशील सतिगुरु को ही मानता हैं, जिसे मिलकर तृष्णा भूख सब दूर हो जाते हैं।
16मैं अपने गुरु पर सदैव कुर्बान जाता हैं, जो सच्चे प्रभु से मिला देता है।
17नानक का कथन है कि बड़े भाग्य से जो गुरु के चरणों में लगे हैं, उन्होंने प्रभु को पा लिया है ॥२०॥
18जिस प्रभु से प्रेम लगा हुआ है, वह सज्जन हरदम मेरे साथ है।
19यद्यपि अंदर-बाहर जाता भी हूँ तो दिल में प्रभु को ही याद करता हूँ ॥२१॥
20जिन्होंने एकाग्रचित होकर परमात्मा का ध्यान किया है, सतिगुरु से दिल लगाया है।
21उनका दुख, भूख, अहंकार इत्यादि बड़ा रोग दूर हो गया है और वे ईश्वर की स्मृति में सब दोषों से रहित हो गए हैं।
22वे ईश्वर का गुणगान करते हैं, उसकी महिमा का उच्चारण करते हैं और महिमा में ही लीन रहते हैं।
23नानक का मत है कि जिसने पूर्ण गुरु को पाया है, उसे सहज स्वाभाविक प्रभु आ मिला है ॥२२ ॥
24मनमुखी जीव माया के मोह में पड़ा रहता है, अतः ईश्वर के नाम से प्रेम नहीं लगाता।
25वह झूठ ही कमाता है, झूठ जोड़ता है और झूठा आचरण ही करता है।
26वह विषय-विकारों के धन को इकट्ठा करता मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, अंततः सब मिट्टी हो जाता है।
27वह कर्म-धर्म, शुद्धता एवं संयम इत्यादि करता है, परन्तु मन में लोभ विकारों में ग्रस्त रहता है।
28गुरु नानक फुरमाते हैं कि मनमुखी का कोई भी कार्य सफल नहीं होता और प्रभु-दरबार में ख्यार होता है ॥२३॥
29सब रागों में वहीं राग भला है, जिस द्वारा ईश्वर मन में बसता है।
30राग-संगीत सब सच्चे हैं, इनकी महत्ता अव्यक्त है।
31ईश्वर तो रागों-संगीत से भी बड़ा हैं, इन द्वारा उसके हुक्म को समझा नहीं जा सकता।
32गुरु नानक फुरमान करते हैं जो लोग सतगुरु से सूझ प्राप्त करते हैं, वहीं उसके हुक्म को समझ पाते हैं और उनका ही राग गान सफल होता है।
33सब कुछ उससे ही पैदा हुआ है, जैसे उस मालिक की मर्जी है, वैसा ही होता है ॥२४ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं