सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1421 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1जब मालिक अपनी कृपा-दृष्टि कर देता है तो स्वतः ही सफल कर देता है।

2गुरु नानक फुरमान करते हैं जिन्होंने गुरु-चरणों में लगकर परमात्मा का भजन किया है, उनका जन्म सफल हो गया है ॥६३॥

3भगवा वस्त्र धारण करने या मलिन वेष से योग प्राप्त नहीं होता।

4गुरु नानक फुरमान करते हैं- दरअसल योग की प्राप्ति सतिगुरु के उपदेश से घर बैठे ही हो जाती है ॥६४ ॥

5बेशक चारों दिशाओं में भ्रमण किया जाए, कोई फायदा नहीं या चारों युग वेदों का पाठ-पठन कर लो।

6गुरु नानक कथन करते हैं कि जब सच्चे गुरु से भेंट होती है तो ईश्वर मन में बसता है एवं सुगम ही मोक्ष मिल जाता है ॥६५॥

7गुरु नानक फुरमान करते हैं कि सब ओर मालिक का हुक्म चल रहा है, हे मित्र ! तेरी बुद्धि खराब हो गई है, चंचल मन दोलायमान हो गया है।

8मनमुखों से दोस्ती करके सुख की क्यों उम्मीद कर रहे हो।

9उचित तो यही है कि गुरमुखों से दोस्ती कर और सच्चे गुरु के साथ मन लगा।

10हे मित्र ! जन्म-मरण का बन्धन कट जाएगा और सुख पाओगे ॥६६ ॥

11जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि कर देता है, भूले-भटके को सही की समझ मिल जाती है।

12नानक का कथन है कि ईश्वर की कृपा से वंचित रहने वाला दुखों में ही रोता है ॥६७ ॥

13सलोक महला ४

14वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।

15वे जीव स्त्रियाँ खुशनसीब हैं, सुहागिन कहलाने की हकदार हैं, जिनको गुरु द्वारा पति-प्रभु मिला है।

16गुरु नानक फुरमान करते हैं कि इनके मन में प्रकाश हो जाता है और वे प्रभु-नाम में समाहित हो जाती हैं ॥१॥

17जिसने परमसत्य परमेश्वर को जान लिया है, वाह वाह !! वह सतिगुरु महान् है।

18उसे मिलकर प्यास दूर हो जाती है और तन मन को शान्ति प्राप्त हो जाती है।

19सत्य की मूर्ति सतिगुरु स्तुति योग्य है (क्योंकि उसके लिए छोटा अथवा बड़ा हर कोई एक जैसा है।

20प्रेम की मूर्ति सतिगुरु वाह-वाह का हकदार है, जिसके लिए निन्दा अथवा प्रशंसा समान ही होती है।

21जिसके मन में ब्रह्म का चिंतन हैं, वह बुद्धिमान सतिगुरु तारीफ के काबिल हैं।

22वह निरंकार सतिगुरु स्तुत्य है, उसका कोई अन्त अथवा आर-पार नहीं।

23जो जीवों के दिल में हरिनाम बसाता है, वह सतिगुरु सराहनीय है।

24गुरु नानक फुरमान करते हैं- वह सतिगुरु वाह-वाह का हकदार है, जिससे ईश्वर का नाम प्राप्त होता है ॥२॥

25प्रभु का कीर्तिगान करो, गुरुमुख बनकर हर रोज़ हरिनाम जपना चाहिए।

26नित्य ईश्वर की सराहना करनी चाहिए, हरि का नाम जपने से मन आनंदमय हो जाता है।

27भाग्यशाली ही प्रभु को पाकर पूर्ण परमानंद पाता है।

28गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जिन जिज्ञासुओं ने हरिनाम का संकीर्तन किया है, उनका मन तन दोबारा दुखी नहीं हुआ ॥३॥

29मेरा तो प्रभु से ही प्रेम लगा हुआ है, उस प्यारे सज्जन से क्योंकर मिला जा सकता है ?

30सत्य से शोभायमान सज्जन को ढूंढ रहीं हैं।

31सच्चा गुरु मेरा मित्र है, अगर मिल जाए तो यह मन उसे न्यौछावर कर दें।

32मेरे प्रियतम (गुरु) सृजनहार प्रभु के बारे में मुझे बताता है।

33हे नानक ! मैं अपने प्रभु को ढूँढ रहीं थी, सतिगुरु ने मन में ही दर्शन करा दिए हैं ॥४॥

34मैं खड़ी रास्ता निहार रही हूँ, शायद मेरा सज्जन आ जाए।

35काश ! कोई आकर आज मुझे मेरे प्रियतम प्रभु से मिला दें।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं