सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 141 · Raag Maajh

1महला १॥

2हे नानक ! पराया हक खाना मुसलमान के लिए सूअर खाने के समान है और हिन्दू के लिए गाय खाने के समान है।

3हिन्दुओं का गुरु एवं मुसलमानों का पीर खुदा की दरगाह में तभी मनुष्य की रक्षा की हामी भरेंगे यदि वह पराया हक न खाए।

4अधिक बातें करने से प्राणी स्वर्गलोक को नहीं जाता। मुक्ति तो सत्य की कमाई द्वारा ही संभव है।

5हराम के भोजन में मसाला डालने से वह हलाल नहीं हो जाता, क्योंकि रिश्वत का धन दान करने से शुद्ध नहीं होता।

6हे नानक ! झूठी बातों से केवल झूठ ही हासिल होता है।॥ २॥

7महला १॥

8मुसलमानों के लिए पाँच नमाजें हैं, एवं नमाज़ों के लिए पाँच ही वक्त हैं और पाँचों नमाजो के साथ अलग-अलग नाम हैं ।

9पहली नमाज यह है कि सच्चे खुदा की बंदगी करो । दूसरी नमाज है कि हक हलाल अर्थात् धर्म की कमाई करो। तीसरी नमाज यह है कि अल्लाह से सबकी भलाई माँगो, दान-पुण्य करो।

10चौथी नमाज यह है की अपनी नीयत एवं मन को साफ रखो। पाँचवी नमाज यह है कि अल्लाह की महिमा एवं प्रशंसा करो।

11तू शुभ कर्मों का कलमा पढ़ और तभी तू स्वयं को सच्चा मुसलमान कहलवा सकता है।

12हे नानक ! जितने भी झूठे हैं, उनकी प्रतिष्ठा भी झूठी है और उन्हें झूठ ही प्राप्त होगा ॥ ३ ॥

13पउड़ी।

14जीव जगत् में व्यापार करने आते हैं। कई जीव नाम रूपी रत्न पदार्थों का व्यापार करते हैं और कई जीव कांच अर्थात् क्षणभंगुर सुखों का व्यापार करते हैं।

15यदि सतिगुरु प्रसन्न हो जाए तो यह नाम रूपी रत्न-पदार्थों का अक्षय भण्डार मिल जाता है।

16जीव के हृदय में ही नाम रूपी रत्न पदार्थों का भण्डार है परन्तु यह भण्डार गुरु के बिना किसी को भी नहीं मिला। अर्थात् परमेश्वर प्राप्त नहीं होता। झूठे एवं अज्ञानी लोग टक्करें मार-मारकर प्राण त्याग गए हैं।

17मनमुख लोग द्वैत भाव में पड़कर गल सड़कर मर जाते हैं और ज्ञान को नहीं समझते।

18एक ईश्वर के अलावा संसार में दूसरा कोई भी नहीं। वह किसके समक्ष जाकर फरियाद करें?

19कई धनहीन निर्धन हैं और हमेशा भटकते फिरते हैं और कईओं के खजाने दौलत से परिपूर्ण हैं।

20लेकिन इस संसार में हरि नाम के अलावा शेष कोई भी धन जीव के साथ जाने वाला नहीं। अन्य सब कुछ विष रूपी माया-धन धूलि के तुल्य है।

21हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही सब कुछ करता है और स्वयं ही जीवों से करवाता है। अपने आदेश द्वारा वह प्रभु स्वयं ही प्राणियों को संवारने वाला है॥ ७॥

22श्लोक महला १॥

23मुसलमान कहलाना बड़ा कठिन है। यदि कोई गुणों से युक्त सच्चा मुसलमान है, तो ही वह अपने आपको मुसलमान कहलवा सकता है।

24सच्चा मुसलमान बनने के लिए सर्वप्रथम बात यह है कि वह अपने पैगम्बर के चलाए धर्म को मीठा समझकर माने। दूसरी बात यह है कि वह अपनी मेहनत की कमाई का धन गरीबों में यूं बांट दे जैसे रंग मार लोहे के जंग को दूर कर देता है।

25वह अपने पैगम्बर के धर्म का सच्चा मुरीद (शिष्य) होकर मृत्यु एवं जीवन के भ्रम को मिटा दे।

26सच्चे दिल से वह ईश्वर की इच्छा को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृत करे, सृष्टिकर्ता परमात्मा की वन्दना करे और अपना अहंकार नष्ट कर दे।

27हे नानक ! यदि वह समस्त प्राणियों पर दयालु हो तो ही वह मुसलमान कहलवा सकता है॥१॥

28महला ४॥

29जो व्यक्ति काम, क्रोध, झूठ, निंदा एवं धन-दौलत को त्यागकर अपना अहंकार मिटा देता है,

30कामवासना का त्याग करके अपनी स्त्री का मोह त्याग देता है, वह माया में रहता हुआ भी निरंजन प्रभु को पा लेता है।

31हे नानक ! सत्यस्वरूप प्रभु उस व्यक्ति के मन में आकर निवास करता है, जो व्यक्ति मान-अभिमान, अपने पुत्र एवं स्त्री का प्रेम, माया की तृष्णा एवं इच्छा को त्याग कर राम में सुरति लगाता है।

32ऐसा व्यक्ति सच्चे शब्द द्वारा हरिनाम में ही समा जाता है॥ २॥

33पउड़ी।

34राजा, प्रजा एवं प्रधानों में किसी ने भी इस संसार में नहीं रहना।

35दुकाने, नगर एवं बाज़ार ईश्वर की इच्छा से नष्ट हो जाएँगे।

36मूर्ख मनुष्य सुन्दर द्वारों वाले पक्के मन्दिरों को अपना समझते हैं।

37धन-दौलत से परिपूर्ण भण्डार एक क्षण में ही खाली हो जाते हैं।

38घोड़ों, सुन्दर रथों, ऊँट, अम्बारियों वाले हाथी, उद्यान, सम्पत्तियाँ, घर एवं इमारतें इत्यादि जिन्हें मनुष्य अपना जानता है, वे अपने कहाँ हैं? तम्बू, निवार के पलंग, अतलस की कनातें सब क्षणभंगुर हैं।

39हे नानक ! सदैव स्थिर एक सत्य परमेश्वर ही है, जो लोगों को यह सब वस्तुएँ देने वाला दाता है। उसकी पहचान उसकी कुदरत द्वारा ही होती है॥ ८ ॥

40श्लोक महला १॥

41हे भगवान ! यदि मेरे लिए नदियां कामधेनु गाय बन जाएँ, समुद्रों का जल दूध एवं घी बन जाए,

42सारी धरती शक्कर बन जाए और मेरा मन इन पदार्थों का सेवन करके प्रसन्न होता हो,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं