सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1419 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1उसका माया-मोह दूर नहीं होता, जिस कारण वह बार-बार जन्मता मरता है।

2यदि तृष्णा एवं विकारों को छोड़कर सतिगुरु की सेवा की जाए तो सुख प्राप्त हो जाता है।

3गुरु नानक फुरमान करते हैं, जिन्होंने शब्द-गुरु का गहन चिंतन किया है, उनके जन्म-मरण का दुख दूर हो गया है॥४६॥

4हे सज्जनो ! मन में हरिनाम का मनन करो, तभी प्रभु-दरबार में सम्मान प्राप्त होगा।

5(हरिनाम से) पाप-दोष सब कट जाते हैं और अहम्-अभिमान समाप्त हो जाता है।

6गुरुमुख का हृदय-कमल सदा खिला रहता है और उसे सब ओर ब्रह्म ही दिखाई देता है।

7गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जब प्रभु अपनी कृपा की बरसात कर देता है तो जिज्ञासु भक्तजन हरिनाम जपते रहते हैं।॥५०॥

8धनासरी राग द्वारा गान करती हुई वही जीव-स्त्री धनवान् मानी जाती है, जो सतिगुरु की सेवा में तल्लीन रहती है।

9वह अपना तन, मन, प्राण सब गुरु को सौंप देती है और गुरु की आज्ञा मानती है।

10जहाँ सतिगुरु बैठाता है, बैठ जाती है, जहाँ भेजता है, वही चली जाती है।

11सच्चे नाम जैसा धन अन्य कोई नहीं।

12मैं सदा सच्चे प्रभु के गुण गाता हूँ और सदैव सच्चे के संग रहता हूँ।

13जो शुभ गुण एवं अच्छाइयों को धारण करता है, वह स्वयं प्रभु के आनंद को पाता है।

14उसकी क्या प्रशंसा की जाए, उसके दर्शनों पर कुर्बान जाना चाहिए।

15सतिगुरु में बहुत सारी खूबियाँ हैं और यह प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होता है।

16किसी को हुक्म मानना नहीं आता और वह द्वैतभाव में फिरता है।

17उसे संग मिलना तो दूर की बात है, बैठने को भी स्थान प्राप्त नहीं होता।

18गुरु नानक फुरमान करते हैं कि ईश्वर का हुक्म वही मानते हैं, जिन्होंने शुरु से हरिनाम की कमाई की होती है।

19मैं इन्हीं पर न्यौछावर हूँ और ऐसे लोगों पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥५१॥

20वही दाढ़ियाँ सच्ची हैं,जों गुरु चरणों में लगती हैं।

21ऐसे लोग अपने गुरु की सेवा में तल्लीन रहते हैं और प्रतिदिन आनंदपूर्वक रहते हैं।

22हे नानक ! वही मुख सुन्दर हैं, जो सच्चे दरबार में दिखाई देते है ॥५२॥

23जिनके मुख सच्चे और दाढ़ी भी सच्ची है, वे सत्य ही बोलते हैं और सत्कर्म ही करते हैं।

24उनके मन में सच्चा उपदेश ही बसता है और सतगुरु में लीन रहते हैं।

25उनकी जीवन-राशि एवं धन भी सच्चा है और उत्तम पदवी ही पाते हैं।

26ये सत्य ही सुनते हैं और सत्य को मन में बसाकर रखते हैं और सत्कर्म ही करते हैं।

27वे सच्चे दरबार में बैठकर सत्य में समा जाते हैं।

28हे नानक ! सतगुरु के बिना सत्य प्राप्त नहीं होता और मनमुखी भूले ही रहते हैं।॥५३॥

29जिज्ञासु पपीहा प्रेम समुद्र में प्रिय प्रिय करता है।

30जब गुरु मिलता है तो ही उसे हरिनाम रूपी शीतल जल प्राप्त होता है और उसके सब दुखों का निवारण हो जाता है।

31नाम जल से उसके अन्तर्मन में स्वाभाविक सुख उत्पन्न होता है और उसे उसकी सब कूक पुकार दूर हो जाती है।

32गुरु नानक फुरमाते हैं- गुरुमुख को ही शान्ति प्राप्त होती है और वह नाम को ही दिल में बसाकर रखता है ॥५४ ॥

33हे जिज्ञासु पपीहे ! तू सच ही बोल, मन सत्य परमेश्वर में लगने लगा।

34गुरु के सान्निध्य में गान करेगा तो तेरा किया गुणानुवाद फलदायक होगा।

35शब्द-गुरु को समझकर प्यास बुझ जाएगी, रज़ा को मानने से ही संभव है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं