सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1418 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1नानक की प्रभु से विनती है कि यदि तुझे ठीक लगे तो हमें बख्श कर अपने साथ मिला लो॥४१॥

2मन को आवागमन की कोई सूझ नहीं और न ही प्रभु दरबार का ज्ञान है।

3मन माया-मोह में लीन होकर अज्ञान के अन्धेरे में ही रहता है।

4जब यम का भारी दण्ड लगता है तो ही व्यक्ति मोह की निद्रा से जागता है।

5गुरमुख हरदम परमात्मा की स्तुति में लीन रहते हैं और वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

6हे नानक ! वे स्वयं तो मुक्त होते ही हैं, पूरे परिवार को पार करवा देते हैं ॥४२॥

7असल में वही मरता है, जो शब्द से (विकारों की ओर से) मरता है।

8गुरु की कृपा से हरि भजन का आनंद प्राप्त होता और

9शब्द-गुरु से प्रभु-दरबार में सम्मान हासिल होता है।

10शब्द के बिना हर कोई मरता है,

11पर मनमुख मरकर अपना जीवन गंवा देते हैं।

12वे ईश्वर को स्मरण नहीं करते और आखिर में दुख-मुसीबतों में पड़कर रोते हैं।

13गुरु नानक फुरनाते हैं कि दरअसल (इनका भी कोई कसूर नहीं) जो परमेश्वर करता है, वही होता है।॥४३॥

14जिनके मन में ज्ञान-ध्यान होता है, ऐसे गुरुमुख कभी बूढ़े नहीं होते।

15वे अन्तर्मन में सहज स्वाभाविक ध्यान लगाए रखते हैं और सदैव परमात्मा की प्रशंसा व गुण गान में मस्त रहते हैं।

16वे सदैव आनंदमय एवं विवेकवान बने रहते हैं और दुख-सुख को बराबर ही मानते हैं।

17उनको सब में परमात्मा ही दिखाई देता है और अन्तरात्मा में उनको ब्रह्म की पहचान हो जाती है।॥४४॥

18स्वेच्छाचारी बच्चों-बूढ़ों की तरह हैं, जिनके मन में ईश्वर की स्मृति नहीं होती।

19वे अभिमान में फँसकर कर्म करते हैं, जिस कारण यमराज ही उनके कर्मो का हिसाब करता है।

20जो गुरु के उपदेश में रत रहते हैं, ऐसे गुरुमुख अच्छे एवं दिल से निर्मल हैं।

21वे सतिगुरु की रज़ानुसार जीवन-आचरण बिताते हैं और उनको कोई मोह-माया की मैल नहीं लगती।

22स्वेच्छाचारी को सौ बार भी धोया जाए परन्तु उसकी जूठन दूर नहीं होती।

23हे नानक ! गुरुमुख गुरु की शरण में ही समाए रहते हैं।॥४५॥

24जो किसी का बुरा करता है, उसकी भी क्या दशा होती है।

25वह स्वयं भी क्रोध की ज्वाला में जलता रहता है।

26स्वेच्छाचारी पगला बना उलझनों में फँसा रहता है।

27जब गुरुमुख बन जाता है तो उसे सब ज्ञान हो जाता है।

28हे नानक ! गुरमुख मन से ही जूझता है॥४६॥

29जिन्होंने सतगुरु की सेवा नहीं की, न ही ब्रह्म-शब्द का चिंतन किया है,

30वे मनुष्य नहीं, दरअसल ऐसे मूर्ख तो पशु कहलाने के हकदार हैं।

31उनके मन में कोई ज्ञान-ध्यान नहीं होता और वे ईश्वर से भी प्रेम नहीं करते।

32स्वेच्छाचारी विकारों में ही मरते हैं और बार-बार जन्म-मरण को प्राप्त होते हैं।

33जिसने दिल में परमात्मा को बसाया है, उस आत्मिक रूप से जीवित गुरमुख को मिलकर अन्य भी जिंदा हो जाते है।

34गुरु नानक फुरमान करते हैं कि प्रभु के दरबार में गुरमुख ही सुन्दर लगते हैं॥४७॥

35शरीर रूपी हरिमन्दिर की रचना हरि ने ही की है और वह उसी में रह रहा है।

36गुरु की शिक्षा से माया-मोह को दूर करने से ही हरि प्राप्त होता है।

37हरिमन्दिर में अनेक वस्तुएँ मौजूद हैं, सुखों के भण्डार हरिनाम का स्मरण करो।

38नानक फुरमान करते हैं- वह जीव-स्त्री धन्य एवं भाग्यशाली है, जिसने गुरु द्वारा प्रभु को प्राप्त किया है।

39उस भाग्यशाली ने शरीर रूपी मन्दिर में खोजकर प्रभु को पा लिया है॥४८ ॥

40मनमति पुरुष तृष्णा, लोभ, विकारों में फँसकर दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं