सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1417 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1हे नानक ! जो शब्द से (विकारों की ओर से) मरता है, उसी का मन संतुष्ट होता है और सच्चा यश पाता है॥३३॥

2माया-मोह दुखों का भयानक सागर है, इस कठिन सागर से तैरा नहीं जा सकता।

3अहम्-भाव करते कितने ही लोग खत्म हो गए हैं और अभिमान में ही उनकी जिन्दगी गुजर गई है।

4हठधर्मी व्यक्तियों को किनारा नहीं मिलता और वे बीच में ही रह जाते हैं।

5दरअसल जो विधाता ने तकदीर में लिख दिया है, वही करना पड़ता है, अन्य कुछ नहीं हो सकता।

6गुरु की शिक्षा से मन में ज्ञान बसता है और स्वाभाविक ही सब ओर ब्रह्म दिखाई देता है।

7हे नानक ! सतिगुरु रूपी जहाज़ पर खुशकिस्मत ही चढ़ता है और वह संसार-समुद्र से पार हो जाता है।॥३४॥

8गुरु के सिवा कोई दाता नहीं, जो हरिनाम का आसरा प्रदान करे।

9गुरु की कृपा से मन में हरिनाम बसता है, जो सदैव दिल में बसा रहता है।

10हरिनाम से प्रेम करने से तृष्णा बुझ जाती है, मन तृप्त हो जाता है।

11हे नानक ! गुरु तब प्राप्त होता है, जब ईश्वर अपनी कृपा करता है॥३५॥

12शब्द के बिना समूचा जगत बावला हो रहा है, इस बारे अन्य कुछ कहा नहीं जा सकता।

13जिनकी परमात्मा हिफाजत करता है, ऐसे लोग शब्द में लीन रहकर बच जाते हैं।

14हे नानक ! जिसने रचना रची है, वह विधाता सब जानता है॥३६॥

15होम, यज्ञ, तीर्थ एवं वेद-पुराणों का पाठ-पठन करके पण्डित भी हताश हो गए हैं,

16लेकिन मोह-माया का जहर दूर नहीं होता और अभिमान में आवागमन बना रहता है।

17जब सतगुरु मिलता तो मन की मैल धुल जाती है और मन सुजान परमेश्वर का जाप करता है।

18गुरु नानक फुरमाते हैं कि हम उन पर सदैव कुर्बान हैं, जिन्होंने प्रभु की उपासना की है॥३७॥

19अधिकांश व्यक्ति माया-मोह में फँसकर बहुत पाने की तमन्ना करते हैं, बहुत आशाएँ लगा लेते हैं, इस तरह लोभ तथा विकारों में पड़ जाते हैं।

20स्वेच्छाचारी को शान्ति प्राप्त नहीं होती और पल में नष्ट हो जाता है।

21अगर अच्छी किस्मत हो तो जीव को सतगुरु मिल जाता है और वह अभिमान-विकारों को छोड़ देता है।

22हे नानक ! शब्द का मुख्य विचार यही है कि परमात्मा का नाम जपने से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है॥३८॥

23गुरु के बिना भक्ति नहीं होती और न ही हरिनाम से प्रेम लगता है।

24हे नानक ! ईश्वर की आराधना गुरु के प्रेम व रज़ा से ही होती है।॥३६॥

25हे भाई ! जितना भी हो सके, लोभी व्यक्ति का ऐतबार मत करो।

26क्योंकि वह आखिरी वक्त वहाँ पर धोखा देता है, जहाँ बचना मुश्किल हो जाता है।

27स्वेच्छाचारी की संगत करने से मुँह में बदनामी की कालिमा लगती है।

28लोभियों की बेइज्जती होती है और वे अपना जीवन बेकार ही गंवा देते हैं।

29हे ईश्वर ! हमें सत्संगत में मिला दो, ताकि तेरा नाम हमारे मन में बस जाए।

30गुरु नानक फुरमान करते हैं कि ईश्वर की महिमागान करने से जन्म-मरण की मैल साफ हो जाती॥४०॥

31प्रभु ने शुरु से जो तकदीर में लिख दिया है, उसे बदला या मिटाया नहीं जा सकता।

32प्राण, शरीर सब उसी का दिया हुआ है, वह स्रष्टा परमेश्वर ही हमारा पालन-पोषण करता है।

33चुगलखोर एवं निंदा करने वाले भूखे ही खत्म हो जाते हैं और उनको कुछ भी नहीं मिलता।

34वे बाहर से पाखण्ड एवं सब कर्म करते हैं, परन्तु उनके दिल में कपट ही भरा रहता है।

35शरीर रूपी खेत में जो अच्छा-बुरा बोया होता है, आखिर उसी का फल सामने आ जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं