सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1416 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1गुरु नानक फुरमान करते हैं कि परमात्मा के नाम में लीन रहने वाले ही धनवान् हैं और बाकी संसार के लोग निर्धन हैं।॥२६॥

2ईश्वर का नाम ही सेवक का आसरा है, ईश्वर के बिना उसका कोई ठिकाना नहीं।

3गुरु के उपदेश से मन में हरिनाम बसता है और वह सहज स्वाभाविक ही सत्य में विलीन हो जाता है।

4बड़े भाग्य से परमात्मा का मनन किया है, दिन-रात उसी से प्रेम लगा हुआ है।

5नानक का कथन है कि मैं तो प्रभु-भक्तों की चरण-धूल ही चाहता हूँ और उन पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥२७॥

6चौरासी लाख योनियों वाली पृथ्वी तृष्णाग्नि मैं जलती हुई पुकार करती है कि

7यह माया-मोह सब ओर फैला हुआ है और अंत में कोई साथ नहीं देता।

8भगवान के बिना शान्ति प्राप्त नहीं होती, फिर किसके आगे पुकार की जाए।

9जिस भाग्यशाली ने सतिगुरु को प्राप्त किया है, उसने ब्रह्मज्ञान जान लिया है।

10गुरु नानक फुरमान करते हैं- जिन भक्तजनों ने ईश्वर को दिल में बसाया है, उनकी तृष्णाग्नि बुझ गई है॥२८ ॥

11हम बहुत गलतियाँ एवं कसूर करते हैं, जिनका कोई अन्त नहीं पाया जा सकता।

12हे परमेश्वर ! कृपा करके हमें क्षमा कर दो, हम पापी एवं बड़े गुनहगार हैं।

13यदि हमारे पापों का हिसाब करने लग गए तो अन्त नहीं हो पाएगा, तू कृपा करके चरणों में मिलाने वाला है।

14दरअसल गुरु प्रसन्न होकर प्रभु से मिलाने वाला है और वह सब पाप-विकार काट देता है।

15गुरु नानक फुरमाते हैं- जिन्होंने परमात्मा का भजन किया है, उनकी ही जग में कीर्ति हुई है॥२६॥

16अनेक जन्मों से बिछुड़े हुए जो सतिगुरु के प्रेम में मिले रहते हैं।

17जो गुरु की शरण में परमात्मा का ध्यान करते हैं, उनका जन्म-मरण निवृत हो जाता है।

18जो लोग गुरु साधु की संगत में आते हैं, उनको नाम रूपी अमूल्य हीरे एवं रत्न ही प्राप्त होते हैं।

19गुरु नानक फुरमान करते हैं- हरिनाम रूपी अमूल्य मोती गुरमुख जिज्ञासु ही खोजते हैं।॥३०॥

20मन की मर्जी करने वाले प्रभु नाम का चिंतन नहीं करते, उनका जीना एवं रहना धिक्कार योग्य है।

21जिस दाता का दिया खाने-पहनने को मिलता है, उस गुणनिधान को ये दिल में नहीं बसाते।

22जब तक यह मन शब्द में विंध नहीं पाता, सच्चे घर में कैसे रहा जा सकता है।

23स्वेच्छाचारी जीव-स्त्रियाँ दुहागिन हैं, आवागमन में पड़ी रहती हैं।

24गुरुमुख का हरिनाम सुहाग है और मस्तक पर यही चिन्ह लिखा है।

25जो परमात्मा को दिल में बसाता है, उसका हृदय-कमल खिल जाता है।

26जो अपने सतिगुरु की सेवा में लीन रहते हैं, मैं उन पर सदैव बलिहारी जाता हूँ।

27हे नानक ! उन्हीं के मुख उज्ज्वल होते हैं, जिनके मन में नाम का आलोक होता है।॥३१॥

28जो शब्द द्वारा (मायावी वृति की तरफ से) मरता है, वही व्यक्ति बन्धनों से मुक्त माना जाता है और शब्द के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती।

29मनुष्य वेषाडम्बर करते हैं, बहुत सारे कर्मकाण्डों में पड़े रहते हैं और द्वैतभाव ने पूरी दुनिया को दुखों में डाल रखा है।

30हे नानक ! यदि कोई कितनी भी अभिलाषा करे, परन्तु गुरु के बिना नाम प्राप्त नहीं होता।॥३२॥

31परमात्मा का नाम सबसे बड़ा, सर्वोत्कृष्ट, ऊँचे से ऊँचा, कीर्तिमान है।

32उस तक कोई पहुँच नहीं सकता, बेशक कोई कितनी भी आकांक्षा करे।

33मुँह से बोलने से संयम नहीं होता, हर कोई वेषों में घूम रहा है।

34गुरु की सीढ़ी पर भाग्यशाली ही चढ़ता है, जो कर्म-फल से प्राप्त होती है।

35जो कोई शब्द-गुरु का चिंतन करता है, उसके दिल में प्रभु बस जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं