गुरु ग्रंथ साहिब 1415 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji
1अन्तरात्मा में प्रभु की पूजा नहीं करता, फिर द्वैतभाव में कैसे सुख मिल सकता है।
2उसके मन में अहंकार की मैल भरी रहती है और शब्द से उस मैल को नहीं धोता।
3हे नानक ! परमात्मा के नाम बिना स्वेच्छाचारी अहंकार की मैल में खत्म हो जाते हैं और अपना जीवन व्यर्थ ही खो देते हैं।॥२०॥
4मनमति लोग अंधे एवं बहरे हैं, उनके मन में तृष्णा की अग्नि ही रहती है।
5वे वाणी को नहीं समझते और न ही शब्द-प्रभु का प्रकाश करते हैं।
6उनको तो अपनी होश नहीं, गुरु के वचन पर भी भरोसा नहीं करते।
7ज्ञानी के मन में गुरु उपदेश अवस्थित होता है और वह ईश्वर के ध्यान में सदैव प्रसन्न रहता है।
8ज्ञानी को प्रभु ही मोह-माया से बचाता है, ऐसे व्यक्ति पर तो मैं सदैव कुर्बान जाता हूँ।
9गुरु नानक फुरमाते हैं कि जो गुरुमुख जन ईश्वर की आराधना करते हैं, हम उनके दास हैं॥२१॥
10माया जहरीली नागिन है, इसके जहर ने पूरे जगत को घेर रखा है।
11हरिनाम इस जहर का अंत करने वाला है और गुरु रूपी गरुड़ शब्द मुख में डालता है।
12जिनके भाग्य में प्रारम्भ से लिखा होता है, उनका सतिगुरु से मिलाप हो जाता है।
13सतिगुरु से मिलकर मन निर्मल हो जाता है और अभिमान रूपी जहर बाहर निकल जाता है।
14गुरुमुख प्राणियों के मुख उज्ज्वल होते हैं और वे प्रभु-दरबार में शोभा के पात्र बनते हैं।
15गुरु नानक फुरमाते हैं- जो सतिगुरु की आज्ञानुसार चलते हैं, मैं उन पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥ २२॥
16प्रेम की मूर्त सतिगुरु निर्वेर है, उसके दिल में हरदम प्रभु-भक्ति की लगन लगी रहती है।
17जो सज्जनों से वैर करता है, वह अपने घर में आग लगाता है।
18मन में क्रोध एवं अहंकार के कारण वह प्रतिदिन जलता है और सदैव दुखी होता है।
19वह झूठ बोल-बोलकर नित्य भौंकता है और द्वैतभाव में जहर सेवन करता है।
20ऐसे व्यक्ति माया जहर की खातिर भटकते हैं और घर-घर इज्जत गंवाते हैं।
21वेश्या के पुत्र की तरह उनको (गुरु) पिता का नाम नहीं मिलता।
22वे ईश्वर को याद नहीं करते और स्वयं ही दुख-तकलीफों में ख्वार होते हैं।
23परमात्मा कृपा करके स्वयं ही बिछुड़े हुओं को मिला लेता है।
24गुरु नानक फुरमाते हैं- जो सतिगुरु के चरणों में लगते हैं, मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ॥२३॥
25हरिनाम में लीन होने वाले तो बच जाते हैं, अन्यथा नाम से विहीन रहकर यमपुरी जाना पड़ता है।
26हे नानक ! हरिनाम के बिना सुख प्राप्त नहीं होता और जीव आवागमन में पछताता रहता है॥२४ ॥
27जब चिन्ता-बेचैनी दूर हो जाती है तो मन में आनंद पैदा होता है।
28गुरु की कृपा से तथ्य को समझने वाली जीव-स्त्री बेफिक्र होकर सोती है।
29जिनके भाग्य में पूर्व से लिखा होता है, उनकी गुरु-परमेश्वर से भेंट हो जाती है।
30हे नानक ! जो सहज-स्वाभाविक मिले रहते हैं, वही परमानंद प्रभु को पाते हैं॥२५॥
31जो गुरु-शब्द का चिंतन करते हुए सतिगुरु की सेवा करते हैं।
32सतिगुरु की रज़ा को मानकर परमात्मा को अपने दिल में बसाते हैं,
33वे लोक-परलोक में यश पाते हैं और हरिनाम के व्यापार में लीन रहते हैं।
34वे गुरु के उपदेश से सच्चे दरबार में माननीय होते हैं।
35इनके मन में प्रभु से प्रेम बना रहता है और इनका सौदा एवं खर्च सब सच्चा होता है।
36यमराज इनके निकट भी नहीं आता और प्रभु स्वयं ही बख्श देता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं