सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1414 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Amar Daas Ji

1प्रभु बे-परवाह है, वह किस तरह तृप्त होता है।

2जो सतिगुरु की रज़ानुसार चलता है, गुणगान करता है तो ही प्रभु तृप्त होता है।

3गुरु नानक कथन करते हैं कि कलियुग में वही व्यक्ति प्रशंसा के पात्र हैं, जो सतिगुरु की रज़ा में चलते हैं।॥ १२ ॥

4जो सतगुरु की सेवा नहीं करते, न ही शब्द-प्रभु को अपने दिल में बसाते हैं।

5ऐसे लोगों का जीना धिक्कार योग्य है, वे संसार में क्योंकर आए हैं।

6गुरु की शिक्षा से मन में श्रद्धा उत्पन्न होती है तो हरि से प्रेम लगन लग जाती है।

7नानक का कथन है केि जिसके भाग्य में प्रारम्भ से लिखा होता है, उसे ही हरिनाम प्राप्त होता है और वह संसार-सागर से मुक्त हो जाता है।॥ १३॥

8दुनिया माया-मोह में भटक रही है, उसका घर लुट रहा है किन्तु उसे कोई खबर नहीं होती।

9काम-क्रोध ने मन को चुरा लिया है और मन-मर्जी करने वाला अन्धा बना हुआ है।

10जो गुरु के उपदेश से सजग होता है, वह ज्ञान की तलवार से पाँच विकारों का अन्त कर देता है।

11हरिनाम रत्न से जीव के अन्तर्मन में उजाला होता है, इससे मन तन निर्मल हो जाता है।

12ईश्वर के नाम से विहीन रहने वाले तिरस्कार ही पाते हैं और नाम के बिना बैठकर पछताते हैं।

13गुरु नानक फुरमाते हैं- विधाता ने जो तकदीर में लिख दिया है, उसे कोई बदल नहीं सकता ॥१४॥

14गुरु के उपदेश का मनन करके गुरुमुख हरिनाम धन का लाभ प्राप्त करते हैं।

15नाम पदार्थ पाकर उनके भण्डार भर जाते हैं।

16वे वाणी से परमात्मा की सराहना करते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं।

17हे नानक ! स्रष्टा प्रभु सब करने-करवाने वाला है, वही सब देखता है॥१५॥

18गुरुमुख के अन्तर्मन में शान्ति बनी रहती है और उसका मन दसम द्वार में दाखिल हो जाता है,

19वहाँ पर कोई निद्रा अथवा भूख नहीं और हरिनाम अमृत का सुख रहता है।

20गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जहाँ सर्वात्म है, वहाँ दुख-सुख का प्रभाव नहीं ॥१६॥

21सब लोग काम-क्रोध का पहनावा धारण करके आते हैं।

22कोई जन्म लेता है तो कोई मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, इस प्रकार ईश्वर के हुक्म से आवागमन बना रहता है।

23लोग द्वैतभाव में लीन रहते हैं, जिस कारण जन्म-मरण का चक्र दूर नहीं होता।

24जीव संसार के बन्धनों में पड़कर योनि-चक्र में भटकते रहते हैं और उनसे स्वयं कुछ भी किया नहीं जाता (सब परमात्मा की रज़ा में चल रहा है) ॥१७ ॥

25जिन पर ईश्वर कृपा करता है, उनका सतिगुरु से मिलन हो जाता है।

26सतिगुरु को मिलकर उनका जीवन बदल जाता है और सहज स्वाभाविक ही मरजीवा हो जाते हैं।

27हे नानक ! वे भक्ति में लीन रहकर प्रभु में समा जाते हैं।॥१८॥

28स्वेच्छाचारी की बुद्धि चंचल है, वह मन में बहुत चतुराई करता है।

29उसका किया-कराया सब व्यर्थ हो जाता है और कुछ भी साकार नहीं होता।

30जो दान पुण्य करते हैं, यमराज के समक्ष पड़ताल होती है।

31सतिगुरु के बिना यमराज नहीं छोड़ता और वह द्वैतभाव में दुखी होता है।

32यौवन गुजरते मालूम नहीं होता, बुढ़ापा आ जाता है और मौत को प्यारा हो जाता है।

33पुत्र-पत्नी से मोह प्रेम बना हुआ था लेकिन अंतकाल कोई साथी नहीं बनता।

34सतिगुरु की सेवा से ही सुख प्राप्त होता है और मन में हरिनाम अवस्थित हो जाता है।

35हे नानक ! वे लोग बहुत भाग्यशाली हैं, जो गुरु के द्वारा नाम में लीन रहते हैं।॥१६॥

36स्वेच्छाचारी परमात्मा के नाम को याद नहीं करता और नाम से वंचित होकर दुखी होता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं