गुरु ग्रंथ साहिब 1413 · Salok Vaaraan Thay Vadheek
1सलोक महला ३
2वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।
3जिसके में लोभ अम है, वह अभ्यागत नहीं कहा जा सकता।
4गुरु नानक कथन करते हैं कि उसको दिए दान का फल भी वैसा ही होता है।॥१॥
5गुरु नानक कहते हैं, जो अभय, मायातीत ईश्वर का भिक्षुक होता है,
6उसका भोजन (हरिनाम) कोई विरला (गुरु) ही जुटा पाता है॥२॥
7बेशक पण्डित ज्योतिषी बन जाऊँ, मुख से चार वेदों का पाठ करूँ।
8परंतु अपने आचरण अथवा चरित्र की वजह से ही पूरे संसार में ख्याति पा सकता हूँ॥३॥
9ब्राह्मण-हत्या, गौ-वध, कन्या की हत्या एवं पापी-दुराचारी का धन-सब धिक्कार योग्य है,
10बुरे काम करके बुराइयों का कोढ़ पाना तथा सदा अभिमान बहुत बुरे हैं।
11गुरुनानक फुरमाते हैं परमात्मा को विस्मृत करना इससे भी बड़ा पाप है।
12सब चतुराइयों को छोड़कर केवल तत्व ज्ञान ही रहता हैJ॥४॥
13विधाता ने जो भाग्य लेख लिख दिया है, उसे कोई बदल नहीं सकता।
14गुरु नानक कहते हैं- जो नसीब में लिखा है, वही होता है। जिस पर ईश्वर-कृपा होती है, वह इस सच्चाई को समझ लेता है॥५॥
15जिन लोगों ने झूठे लालच में फँसकर ईश्वर को भुला दिया है,
16ये माया के मोह में काम-धंधों में लगे रहते हैं और उनके अन्तर्मन में तृष्णाग्नि जलती रहती है।
17जिनके हृदय में ईशोपासना की बेल नहीं, भक्ति रूपी फल नहीं, वे माया के धोखे में फंसे रहते हैं।
18स्वेच्छाचारियों को बांधकर ले जाया जाता है और महात्मा रूपी गाय तथा (दुष्ट रूपी) कुत्ते का मेल नहीं होता।
19जब ईश्वर आप ही हमें भुला देता है तो हम भूल जाते हैं और हमारा उससे मिलाप उसके आप मिलाने से ही होता है।
20गुरु नानक फुरमाते हैं कि यदि सतिगुरु की रज़ानुसार चला जाए तो गुरुमुख बनकर संसार के बन्धनों से छुटकारा हो जाता है।॥६॥
21परमात्मा की ही प्रशंसा करो, केवल वही प्रशंसा के लायक है।
22गुरु नानक का कथन है कि हे भाई ! परमात्मा का द्वार ही सच्चा है, अन्य दर छोड़ने योग्य है॥७ ॥
23गुरु नानक फुरमाते हैं- मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ वहाँ एकमात्र ईश्वर ही है।
24जहाँ देखता हूँ, वहाँ एक वही मौजूद है और वह गुरु द्वारा ही प्रगट होता है।॥८॥
25प्रभु-शब्द सब दुखों को दूर करने वाला है, कोई मन में बसा ले (इससे सब दुखों का अन्त होता है)।
26यह मन में गुरु की कृपा से ही बसता है और भाग्य से ही प्राप्त होता है।॥६ ॥
27गुरु नानक फुरमाते हैं- अभिमान करते लाखों असंख्य लोग तबाह हो गए हैं।
28जिसे सतिगुरु मिला, वह सच्चे शब्द में लीन होकर बच गया है॥१० ॥
29जिन्होंने मन लगाकर सतिगुरु की सेवा की है, उन लोगों के चरणों में लग जाओ।
30गुरु के उपदेश से ईश्वर दिल में बसता है और माया की भूख निवृत्त हो जाती है।
31वही व्यक्ति मन से निर्मल एवं साफ है, जो गुरुमुख बनकर हरिनाम में विलीन रहते हैं।
32नानक फुरमाते हैं कि अन्य राजाधिकार झूठे हैं, प्रभु नाम में लीन रहने वाले ही असल में बादशाह हैं॥११॥
33ज्यों पति के घर में प्यारी पत्नी प्रेम-मुहब्बत की चाह करती है।
34वह खूब स्वादिष्ट भोजन एवं मिष्ठान तैयारी करती है।
35वैसे ही भक्तजन मन लगाकर वाणी से परमात्मा की प्रशंसा-गान करते हैं।
36वे अपना मृन, तन, धन सर्वस्व आगे रख देते हैं और अपना सिर भी गुरु के सन्मुख भेंट कर देते हैं।
37भक्तगण भक्ति-भाव की बहुत आकांक्षा करते हैं और प्रभु उनकी हर चाह पूरी करता है और मिला लेता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं