गुरु ग्रंथ साहिब 1411 · Salok Vaaraan Thay Vadheek · Guru Nanak Dev Ji
1यदि मालिक की कृपा-दृष्टि हो जाए तो हाथ पाप-विकारों के कीचड़ में नहीं फँसते।
2गुरु नानक का मत है कि गुरु की शरण में जीव संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है, क्योंकि गुरु सत्य का सरोवर एवं अटल दीवार है॥८॥
3यदि (तृष्णा की) अग्नि को खत्म करना है, तो हरिनाम-जल को ढूंढ लो, परन्तु गुरु के बिना नाम जल प्राप्त नहीं होता।
4लाखों कर्म करने के बाद जन्म-मरण का चक्र पड़ जाता है।
5यदि सतिगुरु की शिक्षानुसार जीवन-रास्ता अपनाया जाए तो यम तंग नहीं करता।
6गुरु नानक का कथन है कि गुरु ही परमात्मा से मिलाता है और तब निर्मल पद प्राप्त होता है।॥६॥
7(पाप रूपी) कीचड़ के सरोवर में (जीव रूपी) कौआ मल-मलकर नहाता है,
8जिससे मन तन मैला होकर अवगुणों से भर जाता है और चोंच भी उसकी गंदगी से भर जाती है।
9जीव रूपी कौआ दुष्टों की संगत में फँसकर संत रूपी हंसों की सरोवर को नहीं जानता।
10ज्ञानी पुरुषों से बेशक इस तथ्य को बूझ लो कि कुटिल लोगों से प्रेम इसी तरह है।
11संत पुरुषों की मण्डली में ईश्वर का भजन करो, गुरुमुख बनकर शुभ कर्म करो।
12गुरु नानक का मत है कि गुरु ही पावन तीर्थ है, जहाँ स्नान करने से तन मन निर्मल हो जाता है।॥१०॥
13यदि ईश्वर की भक्ति एवं प्रेम नहीं किया तो जन्म लेने का कोई फल नहीं।
14यदि मन द्वैतभाव में लीन है तो खाना-पहनना पूरा जीवन आचरण बेकार है।
15देखना-सुनना भी झूठ है और मुँह से बात भी झूठी है।
16गुरु नानक फुरमान करते हैं कि परमात्मा की सराहना करो, अहम्-भाव के कारण जन्म-मरण का चक्र ही बना रहता है॥११॥
17ईश्वर की भजन-बंदगी करने वाले विरले ही हैं, ज्यादा नहीं, बाकी संसार के लोग दिखावा मात्र हैं और बेकार की बातें करने वाले हैं॥१२ ॥
18गुरु नानक फुरमान करते हैं- जिसके दिल पर प्रेम की चोट लगती है, वह तत्क्षण मौत को प्राप्त हो जाता है और जीने की शक्ति छूट जाती है।
19जो ऐसी प्रेम चोट से मरता है, वही सफल होता है।
20यह उसे ही लगती है, जिसे वह लगाता है और वही परवान होता है।
21यह प्रेम तीर ऐसा है, जो उन सज्जनों से निकलता ही नहीं ॥१३॥
22जिस शरीर रूपी बर्तन को कच्चा ही बनाया गया है, उसे भला कोई तीर्थ-स्नान से कैसे पवित्र कर सकता है।
23विधाता ने पाँच तत्वों को मिलाकर शरीर रूपी झूठा खिलौना बनाया है।
24जब उसकी मर्जी होती है तो वह शरीर रूपी बर्तन को गुरु के द्वारा पवित्र कर देता है।
25तब परम ज्योति को जगाकर सही जीवन का बाजा बजने लगता है॥ १४ ॥
26जो व्यक्ति मन से घोर अन्धे अर्थात् महामूर्ख हैं, वे समझाने के बावजूद भी अपने कर्त्तव्य को नहीं जानते।
27वे मन से अन्धे हृदय कमल से भी उलटे हैं और भयानक ही दिखाई देते हैं।
28कुछ लोग कही गई बात जानते हैं, उपदेश को समझते हैं, ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान हैं।
29कोई नाद तक नहीं जानता, किसी के पास कोई ज्ञान नहीं, कोई गीत-संगीत के आनंद को नहीं जानता और किसी को भले बुरे का कोई ज्ञान तक नहीं।
30कुछ ऐसे भी हैं, जिनके पास न कोई सिद्धि है, न बुद्धि है, न ही कोई अक्ल है और एक अक्षर का भी भेद नहीं जानते।
31गुरु नानक का फुरमान है कि दरअसल ऐसे व्यक्ति गधे के समान हैं, जो बिना किसी गुण के अभिमान करते हैं॥१५॥
32असल में वही ब्राह्मण है, जो ब्रह्म को मानता है।
33वह पूजा-पाठ, सादगी में सत्कर्म करता है और
34शील-शान्ति, संतोष का धर्म पालन करता है।
35जो जगत के बन्धनों को तोड़कर मुक्त होता है,
36वही ब्राह्मण जगत में पूजनीय होता है।॥१६॥
37क्षत्रिय वही है, जो सत्कर्मों का शूरवीर माना जाता है।
38यह दान-पुण्य का जीवन अपनाता है।
39खेत को पहचान कर दान का बीज डालता है।
40ऐसा क्षत्रिय ही ईश्वर के दरबार में मान्य होता है।
41जो लोभ-लालच में झूठा कर्म करता है,
42वह अपने किए कर्मों का ही फल पाता है॥१७॥
43तन को तंदूर की तरह गर्म मत करो, न ही हड्डियों रूपी ईंधन को जलाओ।
44सिर-पैरों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, मन में परमात्मा का स्मरण करो ॥१८॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं