सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1410 · Svaiyay Mehl 5

1वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, नाम उसका सत्य है, वह देवी-देवता, मनुष्य सहित सम्पूर्ण सृष्टि की रचना करने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, (समदृष्टि के कारण) वह निर्वेर है, वह कालातीत है (भूत, वर्तमान, भविष्य से परे) वह ब्रह्ममूर्ति अमर है, वह जन्म-मरण के बन्धन से रहित है, वह अपने आप ही प्रगट हुआ है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।

2(वे श्लोक जो ‘आदिग्रंथ' की बाईस वारों में से बढ़ गए, जिनका उन वारों में संकलन नहीं हो सका। इसलिए गुरु अर्जुन देव जी ने उन श्लोकों का ‘सलोक वारां ते वर्धीक' नामक शीर्षक पर संकलन किया)

3महला १ ॥

4(सास अपनी पुत्रवधु को कहती है) हे बड़े-बड़े, ऊँचे वक्षों (अर्थात् जवानी) में मस्त स्त्री ! कुछ गंभीरता एवं समझदारी तो कर।

5पुत्रवधु उत्तर देते हुए सास से कहती है कि मैं झुककर किस तरह प्रणाम कर पाऊँ, जबकि ऊँचे वक्षों के कारण मुझसे झुका ही नहीं जाता।

6हे सखी ! पर्वत की तरह ऊँचे-ऊँचे महल भी ध्वस्त होते देखे हैं,

7इसलिए तू बड़े वृक्षों अर्थात् यौवन का अभिमान मत कर ॥१॥

8हे हिरण की तरह सुन्दर नयनों वाली स्त्री ! एक बहुत गहरी भेद की बात सुन;

9पहले वस्तु को अच्छी तरह पहचान कर तो ही व्यापार करना चाहिए।

10दुर्जनों से दूर रहने की घोषणा करनी चाहिए और मित्रों की जयकार करो।

11जिस पुकार से सज्जनों से मिलन हो जाए, हे स्त्री ! उसी को सोचना चाहिए।

12अपना तन मन सज्जनों को अर्पण कर देना चाहिए, इसी से खुशी मिलती है।

13जिसने साथ छोड़कर चले जाना है, इससे कदापि प्रेम न करो।

14गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जिसने इस सच्चाई को मान लिया है, मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ॥२॥

15हे जीव ! यदि तू पानी में तैरना चाहता है तो उनसे पूछ जिनको तैरना आता है।

16वही व्यक्ति समझदार हैं, जिनको लहरों का पूरा अनुभव है॥३॥

17बेशक कितना ही ऑधी तूफान हो अथवा बाढ़ की लाखों लहरें बह रही हों।

18इस तरह की परिस्थिति में सतगुरु को याद करो, जहाज डूबने का डर नहीं रहेगा।॥४॥

19गुरु नानक उपदेश करते हैं- यह दुनिया कितनी अजीब (एवं स्वार्थी) है,

20यहाँ कोई सच्चा मित्र नहीं,

21भाई-बन्धु का प्रेम खत्म हो गया है।

22दुनिया की खातिर इन्सान अपना धर्म गॅवा देता है ॥५॥

23किसी प्यारे की मृत्यु पर ‘हाय-हाय' करना, रोना-चिल्लाना,

24गालों पर चपत एवं सिर के बाल नोचना ठीक नहीं।

25जो परमेश्वर का नाम जपते हैं और उसकी रज़ा को खुशी-खुशी मानते हैं।

26गुरु नानक का कथन है कि मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ॥६॥

27हे मन ! घबराना नहीं चाहिए, न ही दोलायमान होना चाहिए, बल्कि सच्चे एवं सीधे रास्ते पर चलते जाओ।

28पीछे लौटने की कोशिश की तो बाघ का डर लगता है और आगे अग्नि का तालाब है।

29मेरा दिल संशय में पड़ा हुआ है, मुझे कोई तरीका नहीं आता।

30गुरु नानक का कथन है कि परमात्मा की प्रेम-भक्ति में लीन होकर मुक्ति प्राप्त होती है।॥७॥

31जिसे सतिगुरु से उपदेश प्राप्त होता है, वह अपने मन को मार देता है तो बाघ (दुनिया का डर) स्वतः ही मर जाता है।

32जो आत्म-ज्ञान को पहचान लेता है, उसे ईश्वर मिल जाता है और दोबारा मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं