गुरु ग्रंथ साहिब 140 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji
1फिर भी वह दूसरों को उपदेश करने जाता है कि झूठ मत बोलो।
2जो स्वयं लुटा जा रहा है और अपने साथियों को भी लुटा रहा है,
3हे नानक ! वह इस तरह का नेता मालूम होता है ॥ १॥
4महला ४॥
5जिसके हृदय में सत्य विद्यमान है, वही सत्यतादी है और वह अपने मुख से सत्य बोलता है।
6वह स्वयं हरि के मार्ग चलता है और दूसरों को भी हरि के मार्ग लगाता है।
7यदि सामने पवित्र तीर्थ रूपी सत्संग हो, तब मैल उतर जाती है। लेकिन मंदे पुरुषों के साथ संगति करने से मैल उतरने की जगह और भी मैल लग जाती है।
8सतिगुरु जी पूर्णरूपेण तीर्थ हैं जो दिन-रात हरि-प्रभु के नाम का ध्यान करते रहते हैं।
9वह अपने कुटुंब सहित संसार सागर से पार हो जाता है अर्थात् उसे मोक्ष मिल जाता है और हरि-परमेश्वर का नाम प्रदान करके सारे संसार को पार कर देता है।
10हे नानक ! मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ, जो स्वयं हरि के नाम का जाप करता है और दूसरों से भी नाम का जाप करवाता है॥ २ ॥
11पउड़ी॥
12कई साधू वन प्रदेश में निवास करते हैं और कंदमूल चुनकर उनका सेवन करते हैं।
13कई भगवे रंग के वस्त्र पहन कर योगियों एवं संन्यासियों की भाँति फिरते हैं।
14उनके भीतर अधिकतर तृष्णा है और वे वस्त्रों एवं भोजन की लालसा करते हैं।
15वह अपना अनमोल जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं। इस तरह न वह गृहस्थी हैं और न ही त्यागी।
16यमराज उनके सिर पर मंडराता रहता है क्योंकि वे त्रिगुणात्मक वासना के शिकार हैं।
17जब गुरु के उपदेश से प्राणी परमात्मा के सेवकों का सेवक हो जाता है, तो काल उनके निकट नहीं आता।
18सत्य-नाम उसके सत्यवादी हृदय में निवास करता है और वे घर में रहते हुए भी निर्लिप्त रहते हैं।
19हे नानक ! जो प्राणी अपने सतिगुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, वे सांसारिक अभिलाषाओं से तटस्थ हो जाते हैं॥ ५ ॥
20श्लोक महला १॥
21यदि वस्त्रों को रक्त लग जाए तो वस्त्र अपवित्र हो जाता है।
22जो व्यक्ति दूसरों पर अत्याचार करके उनका रक्त चूसते हैं, उनका मन किस तरह पवित्र हो सकता है ?
23हे नानक ! उस अल्लाह का नाम साफ दिल से मुख से बोलो!
24नाम के बिना आपके सभी कार्य दुनिया के दिखावा मात्र ही हैं और आप सभी झूठे कर्म करते हैं।॥ १॥
25महला १॥
26जब मैं कुछ भी नहीं तो दूसरों को मैं क्या उपदेश कर सकता हूँ? अथवा जब मुझ में कोई भी गुण नहीं तो मैं कैसे गुणों का दिखावा करूँ ?
27जिस तरह का ईश्वर ने मुझे बनाया है, वैसे ही मैं करता हूँ। जिस तरह उसने मुझे कहा है, वैसे ही मैं बोलता हूँ। मैं बुरे कर्मों के कारण पापों से भरा हुआ हूँ। उनको अब मैं धोने का प्रयास करता हूँ।
28मैं स्वयं समझता नहीं लेकिन फिर भी दूसरों को समझाता हूँ। मैं इस तरह का ज्ञानहीन मार्गदर्शक बन सकता हूँ।
29हे नानक ! जो व्यक्ति स्वयं ज्ञानहीन अंधा होकर मार्ग-दर्शन करता है, वह अपने साथियों को भी लुटवा देता है।
30आगे परलोक में जाकर उसके मुख पर जूते पड़ते हैं और फिर पता चलता है कि वह किस तरह का पाखंडी मार्गदर्शक था ॥२ ॥
31पउड़ी॥
32हे अकालपुरुष ! समस्त महीनों, ऋतुओं, घड़ी, मुहूर्त में मैं तेरी वन्दना करता हूँ।
33हे सच्चे अलख, अपार प्रभु ! कर्मों की गणना करके तुझे किसी ने भी नहीं पाया।
34उस पढ़े हुए विद्वान व्यक्ति को महामूर्ख ही समझो, जिसके अन्तर्मन में लोभ, लालच एवं अहंकार है।
35गुरु की मति द्वारा हमें विचार करके नाम को पढ़ना एवं समझना चाहिए।
36जिस व्यक्ति ने गुरु की मति द्वारा नाम रूपी धन की कमाई की है, उसके भण्डार भक्ति से भर गए हैं।
37जिस व्यक्ति ने निर्मल नाम का मन से सिमरन किया है, वह सत्य के दरबार में सत्यवादी स्वीकृत हो जाता है।
38जिसने प्रत्येक जीव को आत्मा एवं प्राण दिए हैं, वह प्रभु अनंत है और उसकी ज्योति प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान है।
39हे प्रभु ! एक तू ही सच्चा शाह है और शेष सारा जगत् वणजारा है॥ ६॥
40श्लोक महला १ ॥
41जीवों पर दया करना ही मस्जिद में जाकर सजदा करना है। अल्लाह पर पूर्ण श्रद्धा रखना ही मुसल्ले पर बैठ कर नमाज पढ़ना है। हक-हलाल अर्थात् धर्म-कर्म करना ही कुरान को पढ़ना है।
42नाम की कमाई करना ही सुन्नत करवाना है। शील स्वभाव का बनना ही रोजा रखना है। तभी तुम एक सच्चे मुसलमान बनोगे।
43सत्य कर्म करना ही मक्का जाकर काबे के दर्शन करना है। सच्चे खुदा को जानना ही पीर की पूजा करना है। शुभ कर्म करना ही कलमा एवं नमाज है।
44अल्लाह की रजा में रहना ही माला फेर कर नाम जपना है। हे नानक ! जो इन गुणों से युक्त होगा तो ही अल्लाह को अच्छा लगेगा और ऐसे मुसलमान की खुदा लाज-प्रतिष्ठा रखता है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं