सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1409 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Mathuraa

1उस गुरु का अन्त सभी देवी-देवता, मुनि स्वर्गाधिपति इंद्र एवं योग-साधना में लीन महादेव शिव भी नहीं पा सके।

2ब्रह्मा वेदों का चिंतन करता रहा, लेकिन उसने भी परमात्मा का जाप एक घड़ी भर नहीं छोड़ा।

3सेवक मथुरा का प्रभु गुरु अर्जुन दीनदयालु है, वह संगत-मण्डली सहित सम्पूर्ण सृष्टि को निहाल कर रहा है।

4दुनिया का उद्धार करने के लिए गुरु रामदास ने अपनी ज्योति गुरु अर्जुन देव में प्रविष्ट की है॥४॥

5जगत् में पापों से बचाने वाला उसके अतिरिक्त कोई नहीं, अतः ईश्वर ने गुरु अर्जुन देव के रूप में संसार में आकर अवतार धारण किया है।

6मथुरा भाट का कथन है कि जिन लोगों ने गुरु-संगत में हरिनामामृत का पान किया है, उनके करोड़ों दुख दूर हो गए हैं।

7हे सज्जनो ! इस सच्चाई से मत चूकना, कहीं यह भेद न मान लेना कि गुरु अर्जुन ईश्वर से भिन्न हैं।

8गुरु अर्जुन देव जी के हृदय में तो साक्षात् पूर्ण ब्रह्म ने निवास किया हुआ है।॥५॥

9जब तक माथे पर भाग्योदय नहीं हुआ, तब तक हम बहुत भटकते रहै।

10कलियुग के घोर समुद्र में डूब रहे थे और संसार समुद्र में डूबने का पश्चाताप कभी मिट नहीं रहा था।

11भाट मथुरा का कथन है कि सच्ची बात यही है कि दुनिया का उद्धार करने के लिए ईश्वर ने गुरु अर्जुन देव के रूप में अवतार धारण किया।

12जिन्होंने गुरु अर्जुन देव जी का जाप किया, वे पुनः गर्भ योनि के संकट में नहीं आए ॥६ ॥

13कलियुग के समुद्र से संसार को मुक्त करने के लिए गुरु अर्जुन देव जी ईश्वर के रूप में प्रगट हुए हैं।

14जिनके हृदय में शान्ति एवं सत्य का स्रोत बस रहा है, वे दुख-दारिद्रय का निवारण करने वाला है।

15वे निर्मल हरि रूप हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।

16जिसने मन वचन से माना है, वह उस जैसा ही हो गया है।

17धरती, आकाश, नौ खण्डों में ज्योति स्वरूप (गुरु अर्जुन) ही विद्यमान है।

18मथुरा भाट का कथन है कि गुरु अर्जुन देव साक्षात् परमात्मा हैं, इसमें कोई फर्क नहीं ॥७ ॥१६ ॥

19गुरु अर्जुन देव जी के पास (हरिनामामृत रूप में) अटल एवं अजय गंगाजल बह रहा है, और समूची शिष्य मण्डली नित्य इसमें स्नान करती है।

20गुरु दरबार में नित्य हरिनाम का जाप, वाणी रूप पुराणों का पठन हो रहा है और ब्रह्मा मुख से वेद गा रहा है अर्थात् गुरु की वाणी पुराण-वेद हैं।

21गुरु के शीश पर अजय चैवर झूलता है और वे मुख से हरि-नामामृत का कीर्तन करते हैं।

22वस्तुतः गुरु अर्जुन देव के शीश पर यह छत्र स्वयं परमेश्वर ने ही सौंपा है।

23श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी (तदन्तर) श्री गुरु रामदास ऑकार स्वरूप परमेश्वर में विलीन हो गए।

24हरिबंस का कथन है कि पूरे जगत में गुरु का यश फैल गया है, अतः कोई नहीं कह सकता कि गुरु (रामदास जी) संसार में नहीं ॥ १ ॥

25श्री गुरु रामदास जी देवपुरी वैकुण्ठ में चले गए, यह स्वयं परमेश्वर की रज़ा से हुआ।

26ईश्वर ने सिंहासन देकर श्री गुरु रामदास जी को विराजमान किया।

27देवताओं ने मंगलगान किया और यश गाते हुए वे जय-जयकार करने लगे।

28असुर सब भाग गए और उनके पाप मन में कांपने लगे।

29जिन्होंने श्री गुरु रामदास जी को प्राप्त किया है, उन लोगों के सब पाप कट गए हैं।

30इस तरह श्री गुरु रामदास जी पृथ्वी का छत्र व सिंहासन गुरु अर्जुन देव जी को सौंप आए हैं।॥२॥२१॥ ६ ॥११ ॥१० ॥ १० ॥२२ ॥६० ॥१४३ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं