गुरु ग्रंथ साहिब 1408 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Kal
1गुरु अर्जुन देव जी ने अभय ईश्वर की अनुभूति की है, जो लाखों में अदृष्ट रूप से व्याप्त है।
2सतिगुरु रामदास ने आप को मन-वाणी से परे, अत्यंत गंभीर ईश्वर का उपदेश दिया।
3गुरु के उपदेश में सफल होकर गुरु अर्जुन देव जी ने राज में योग कर्म किया है।
4गुरु अर्जुन देव जी धन्य धन्य हैं, जिन्होंने खाली दिलों को नाम रस से भर दिया है।
5गुरु पदवी पाने के कारण वे अजर अवस्था में स्थिर रहे और संतोष के सरोवर में विलीन रहे।
6कवि कलसहार का कथन है कि हे गुरु अर्जुन ! तुमने स्वाभाविक सहज योग पा लिया है॥ ८ ॥
7हे गुरु अर्जुन ! आप जी के मुखारबिंद से हरिनामामृत की वर्षा होती है, आप अपने शिष्यों-श्रद्धालुओं को वरदान देते हो, अलख अपार रूप परमात्मा हो, शब्द के सूरमा हो एवं अहंकार का निवारण करने वाले हो।
8हे गुरु अर्जुन ! आप ने पाँच विकारों का अंत कर दिया है। आप जी ने अज्ञानता एवं विकारों का संहार कर दिया है, आप शून्यावस्था में सहज समाधि ईश्वर के ध्यान में रत रहते हो।
9हरिनाम संकीर्तन में तल्लीन होकर आप ने जगत के लोगों का उद्धार किया है और सतिगुरु रामदास को हृदय में बसाया है।
10कलसहार कवि का कथन है कि हे गुरु अर्जुन ! तुमने जनक-सा ज्ञान दीपक प्रज्वलित किया है॥६॥
11सोरठे ॥
12गुरु अर्जुन देव जी साक्षात् ईश्वर का रूप हैं, वे पांडव अर्जुन की तरह कर्म से विचलित नहीं होते।
13परमात्मा का नाम उनका नेजा है और सतिगुरु के उपदेश ने उनका जीवन सफल कर दिया है॥१॥
14यह भवसागर दुस्तर है, हरिनाम सेतु एवं पार लंघाने वाला जहाज है।
15हे गुरु अर्जुन ! तुम्हारा सतिगुरु से ही प्रेम लगा रहता है और प्रभु नाम में लगकर जगत का उद्धार कर दिया है॥२॥
16हे गुरु अर्जुन ! सतिगुरु की प्रसन्नता से आप ने जगत का उद्धार करने के लिए हरिनाम प्राप्त किया है।
17गुरु-घर में सब पूरा हो गया है, अतः किसी अन्य से अब कोई लगाव नहीं ॥३॥१२ ॥
18ज्योति-स्वरूप परमेश्वर आप गुरु नानक कहलाया है।
19फिर उसी ज्योति से ज्योति मिलकर गुरु अंगद का अवतार हुआ।
20गुरु अंगद ने कृपा करके गुरु अमरदास जी को गुरु नानक गद्दी पर मनोनीत किया।
21फिर गुरु अमरदास ने यह अमृत छत्र गुरु रामदास को प्रदान कर दिया।
22मथुरा कवि का कथन है कि गुरु रामदास के दर्शन-स्पर्श से गुरु अर्जुन देव जी की वाणी अमृतमय हो गई।
23(कवि कहता है कि) नि:संकोच उसने पाँचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी को साक्षात् ईश्वर मूर्ति के रूप में आँखों से देखा है॥१॥
24गुरु अर्जुन देव जी सत्य के मूर्त रूप हैं और उन्होंने अपने हृदय में सत्यस्वरूप ईश्वर एवं सत्य-संतोष को धारण किया हुआ है।
25विधाता ने प्रारंभ से उनके माथे पर ऐसा भाग्य लिखा हुआ है।
26उनमें साक्षात् प्रभु-ज्योति जगमगा रही है और उनका तेज पूरे भूमण्डल में फैला हुआ है।
27वे गुरु रामदास रूपी पारस के स्पर्श से पारस रूप गुरु कहलाए हैं।
28मथुरा कवि का कथन है कि सत्य की मूर्ति गुरु अर्जुन में ध्यान लगाओ और मन लगाकर उनके सन्मुख रहो।
29गुरु अर्जुन देव जी कलियुग में जहाज समान हैं, पूरी सृष्टि उनके चरणों में लगकर संसार-सागर से पार उतर सकती है॥ २ ॥
30हे जिज्ञासुओ ! उस दाता गुरु (अर्जुन) से (मुरादें) मांगो, जो पूरे जगत में माननीय है, जो दिन-रात प्रभु-भक्ति में लीन रहता है।
31वह परम वैराग्यवान है और परमेश्वर के रंग में रंगा हुआ है, वह वासनाओं से परे है और गृहस्थी भी दिखाई देता है।
32वह अपरंपार परमपुरुष के प्रेम में लीन रहता है और भगवंत भजन रस के अतिरिक्त उसे अन्य कोई काम नहीं।
33भाट मथुरा के लिए तो गुरु अर्जुन ही सर्वव्याप्त प्रभु है और भक्ति की खातिर वह तो हरदम राम में लीन रहता है।॥३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं