गुरु ग्रंथ साहिब 1407 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Kal
1प्रेमपूर्वक गुरु अर्जुन देव जी का यशगान करता हूँ।
2वाणी के जहाज, गुरु अर्जुन देव जी ने गुरु रामदास जी के घर (बीबी भानी जी के उदर से सन् १५६३ ई. को गोइंदवाल) में जन्म लिया और
3सब मनोरथ एवं कामनाएँ पूरी हो गई।
4हे गुरु अर्जुन ! तुमने जन्म लेते गुरु-मत से ब्रह्म को पहचान लिया था।
5कल्ह कवि हाथ जोड़ कर तेरा ही यश गा रहा है।
6तुमने भक्ति एवं योग को जीत लिया था और परमेश्वर ने ‘जनक' पैदा किया है।
7तुमने शब्द-गुरु को प्रगट किया है और अपनी रसना से हरिनाम का उच्चारण करते उसे दिल में बसाए रखा।
8तुमनै गुरु मानक, गुरु अंगद, गुरु अमरदास जी के चरण कमल में लगकर उत्तम पद पा लिया है।
9इस तरह गुरु रामदास जी के घर हरि के परम भक्त गुरु अर्जुन देव जी का अवतार हुआ है।॥१॥
10गुरु अर्जुन देव जी भाग्यशाली हैं, शांतचित्त खिले हुए हैं और उनके ह्रदय में प्रभु-शब्द बसा हुआ है।
11हे गुरु अर्जुन देव ! आपके मन में माणिक्य रूपी संतोष है और गुरुदेव पिता ने आपको हरिनाम का जाप करवाया है।
12इस तरह सतिगुरु श्री रामदास जी ने आपको अपहुँच, ज्ञानेन्द्रियों से परे परब्रह्म का दर्शन करवाया है।
13गुरु रामदास जी के घर में ईश्वर ने गुरु अर्जुन देव को ज्ञान रूप में टिकाया है ॥२॥
14जनक सरीखे गुरु अर्जुन ने सत्य, धर्म एवं ज्ञान को सर्वत्र फैला दिया है, जिससे हर तरफ सतियुग ही विद्यमान लग रहा है।
15गुरु के उपदेश से आपका मन पूर्णतया तृप्त हो गया है, जो इससे पूर्व अतृप्त रहता था।
16गुरु नानक देव जी सत्य की आधारशिला रखकर सतिगुरु अर्जुन देव जी में समाहित हुए हैं।
17गुरु रामदास के घर गुरु अर्जुन देव जी अपरंपार रूप बने हुए हैं।॥३॥
18ईश्वर ने विचित्र ही लीला की है, गुरु अर्जुन देव जी शान्ति एवं संतोष में रहते हैं और वे निर्मल बुद्धि में लीन हैं।
19वे जन्म-मरण से रहित हैं, स्वयंभू परमेश्वर रूप हैं और कवि कल्ह उनका सुयश गा रहा है।
20गुरु नानक ने (सेवा भाव एवं भक्ति से प्रसन्न होकर) गुरु अंगद को वर प्रदान किया और गुरु अंगद ने तो गुरु अमरदास को कृपादृष्टि करके पूरा खजाना ही दे दिया।
21गुरु रामदास ने गुरु अर्जुन देव को वरदान देकर पारस की तरह बना दिया है।॥४॥
22गुरु अर्जुन देव जी चिरंजीव हैं, उनके गुणों का मूल्य नहीं किया जा सकता है, वे जन्म-मरण के चक्र से स्वतंत्र हैं एवं स्वयंभू हैं।
23वे भय को समाप्त करने वाले हैं, लोगों के दुखों का निवारण करने वाले हैं, अपरंपार एवं ज्ञान की मूर्त हैं।
24वे अगम्य को पहुँचने वाले, भ्रम-भांतियों का नाश करने वाले, शान्ति का घर एवं सुखों के दाता हैं।
25ऐसा लग रहा है, जैसे स्वयंभू, अनादि, पूर्ण पुरुष विधाता संसार में प्रगट हो गया है।
26आदि गुरु नानक, गुरु अंगद, गुरु अमरदास के वर से सतिगुरु अर्जुन शब्द में समाहित हैं।
27श्री गुरु रामदास जी धन्य हैं, जिन्होंने गुरु अर्जुन देव जी को पारस की तरह अपने जैसा (महान्) बना लिया है॥५॥
28जिस गुरु अर्जुन की पूरी दुनिया में जय-जयकार हो रही है, वे पूर्ण सौभाग्यशाली हैं, वे ईश-वंदना में लीन रहते हैं।
29बड़े भाग्य से उन्होंने पूर्ण गुरु प्राप्त किया है, वे ईश्वर के ध्यान में लीन रहते हैं, पूरी पृथ्वी का भार सहन करते है।
30वे भय को नाश करने वाले, दूसरों की पीड़ा एवं दर्द का निवारण करने वाले हैं। भाट कलसहार उस महान् मूर्ति गुरु अर्जुन जी का यश गाता है।
31सोढी वंश के दीपक, गुरु रामदास जी के सुपुत्र, धर्म ध्वजा वाले, शान्ति के पुंज गुरु अर्जुन देव जी परमात्मा के परम भक्त हैं॥६ ॥
32वे धर्मात्मा हैं, सहनशील हैं, गुरु-मत में गहन-गंभीर हैं, गुरु अर्जुन देव जी दूसरों के दुख दूर करने वाले हैं।
33वे शब्द में श्रेष्ठ, परमात्मा के समान उदारशील एवं अहंकार का निवारण करने वाले हैं।
34सतिगुरु अर्जुन देव जी महादानी एवं ज्ञानी हैं और उनके मन से ईशोपासना का चाव कभी नहीं छूटता।
35वे सत्यशील हैं और हरिनाम मंत्र रूपी सुखों की निधि उन से कभी खत्म नहीं होती।
36गुरु रामदास जी के सुपुत्र गुरु अर्जुन देव जी नभ की तरह सर्वव्यापक हैं और उन्होंने सहज स्वभाव का चंदोआ तान रखा है।
37कलसहार का कथन है कि हे गुरु अर्जुन ! तुमने राज योग का रस जान लिया है॥७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं