सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 1406 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Bal

1कवि कीरत का कथन है कि जो शान्ति के पुंज, संत गुरु रामदास के चरणों में लगता है, उसका काम-क्रोध एवं यम का डर दूर हो जाता है।

2जैसे गुरु अंगद देव जी गुरु नानक देव जी के अंग-संग सेवा में तल्लीन रहे, वैसे ही गुरु अमरदास की सेवा में गुरु रामदास जी रहे॥ १॥

3जिस (गुरु रामदास) ने सतिगुरु अमरदास की सेवा में अनुरक्त रहकर हरिनाम पदार्थ पाया और दिन-रात प्रभु-चरणों में लीन रहे।

4उनकी शिष्य मण्डली बहुत अधिक है, जो उनके प्रेम भाव को मानती है और कहती है कि तुम साक्षात् चन्दन की सुगन्धि रूप में प्रगट हो।

5धुव, प्रहलाद, कबीर, त्रिलोचन को परमात्मा का नाम जपते प्रकाश प्राप्त हुआ।

6जिसके दर्शन से मन को अपार खुशी प्राप्त होती है, वह गुरु रामदास सज्जन पुरुषों का सहायक है॥ २ ॥

7गुरु नानक ने ईश्वर के नाम को माना और लगन लगाकर उसकी प्रेम-भक्ति की।

8फिर (गुरु नानक के परम शिष्य भाई लहणा) प्रेम के सागर गुरु अंगद देव उनकी सेवा में निमग्न रहे और उन्होंने शब्द-सुरति की मजबूत आधारशिला रखी।

9गुरु अमरदास की कथा अकथनीय है, एक जिह्म से उनके गुणों का वर्णन नहीं किया जा सकता।

10समूची सृष्टि को संसार-सागर से पार उतारने के लिए अब सोढी वंश के सुलतान गुरु रामदास को कीर्ति प्राप्त हुई है॥३॥

11हे सतिगुरु रामदास ! हम जीव अवगुणों से भरे हुए हैं, एक भी हमारे पास गुण नहीं। नामकीर्तन रूपी अमृत को छोड़कर हम केवल विषय-वासनाओं का जहर सेवन कर रहे हैं।

12माया-मोह के भ्रम में पथभ्रष्ट हो गए हैं और पुत्र एवं पत्नी से ही प्रीति लगाई हुई है।

13सुनने में आया है कि गुरु की संगत एक उत्तम रास्ता है, उसके सम्पर्क में यम का डर मिट जाता है।

14भाट कीरत की केवल यही अरदास है कि हे गुरु रामदास ! मुझे अपनी शरण में रख लो॥४॥५८॥

15हे गुरु रामदास ! आप ने मोह का मलियामेट करके उसे बेबस ही कर दिया है, काम को केशों से पकड़कर आप ने पछाड़ दिया है, और तो और

16प्रचंड क्रोध के टुकड़े ही कर दिए हैं, लोभ अपमान को तहस नहस करके खत्म ही कर दिया है।

17जन्म एवं मृत्यु हाथ जोड़कर आपका हर हुक्म मानते हैं।

18आपने भव-सागर को बांध लिया है और प्रसन्न होकर अपने शिष्यों को मुक्ति दे रहे हो।

19आपके शीश पर छत्र विद्यमान है, अटल सिंहासन पर विराजमान हो, आपने योग एवं भोग दोनों को माना है।

20भाट सल्ह सत्य ही बताता है कि हे गुरु रामदास ! तुम्हारा राज अटल है और तुम्हारा दल अटूट है॥१ ॥

21हे सतिगुरु रामदास ! चारों युगों में तूं ही सदा रहने वाला है, स्वयं निरंकार परमेश्वर है।

22देवता, मनुष्य, सिद्ध, साधक एवं शिष्य प्रारंभ से ही सेवा कर रहे हैं।

23युग-युगांतर, अनादि काल से तीनों लोकों में तेरी ही सत्ता का बोलबाला है।

24तुमने वेद-शास्त्रों का उद्धार किया, बुढ़ापे, जन्म-मरण से मुक्त हो।

25गुरु अमरदास जी ने स्थाई रूप में स्थापित किया, स्वयं तो मुक्त हो और अपने शिष्यों एवं अन्य लोगों को संसार-सागर से पार उतारने वाले जहाज हो।

26सल्ह कवि का कथन है कि हे गुरु रामदास ! जो तेरी शरण में आ जाता है, वह पापों एवं मृत्यु से मुक्त हो जाता है॥२ ॥६० ॥

27सवईए महले पंजवे के ५

28वह परब्रह्मा केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।

29मैं उस अचल, अविनाशी परमपुरुष, विधाता का सिमरन कॅरता हूँ,

30जिसका सिमरन करने से दुर्मति की मैल दूर हो जाती है।

31मैं सतिगुरु नानक के चरण-कमल हृदय में बसाता हूँ और

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं