सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1405 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Mathuraa

1माया के मद में मोहित दुनिया को समर्थ गुरु रामदास ने नामामृत प्रदान करके पार उतार दिया है।

2वे कीर्तिवान हैं, सुख-समृद्धि, ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ उनका संग नहीं छोड़ती।

3सेवक दास मथुरा यही तथ्य कहता है कि वे महादानी, बड़े उपकारी, अत्यंत महांबली एवं हरिनाम के परम भक्त हैं।

4जिसके सिर पर गुरु रामदास ने हाथ धरा हो, उसे किसी चीज की कोई परवाह नहीं रहती॥ ७ ॥ ४६ ॥

5तीनों लोकों में परब्रह्म परमेश्वर ही विद्यमान है, अपने जैसा उसने जगत में कोई उत्पन्न नहीं किया।

6अपने आपको भी उसने स्वयं ही पैदा किया है।

7देवता, मनुष्य एवं असुर कोई भी उसका रहस्य नहीं पा सका।

8देवता, असुर, मनुष्य, गण-गंधर्व सब उसे ही खोज रहे हैं, परन्तु उसका भेद किसी ने नहीं पाया।

9वह अविनाशी एवं अडोल है, वह योनियों के चक्र से मुक्त है और स्वयं ही प्रगट हुआ है।

10वह पुरुषोत्तम परमेश्वर परे से परे अपार है।

11वह करण-कारण, सर्वकला समर्थ है, सब जीव मन में उसी का ध्यान करते हैं।

12हे श्री गुरु रामदास ! तुमने हरि-सा परमपद पा लिया है, जगत में तुम्हारी जय-जयकार हो रही है॥१॥

13सतिगुरु नानक देव जी ने दत्तचित होकर निरंकार की भक्ति की, उन्होंने अपना तन, मन, धन, सर्वस्व ईश्वर पर न्यौछावर कर दिया।

14गुरु अंगद देव जी ने प्रेम की मूर्ति परमेश्वर को अपने मन में बसाया और ज्ञान के कारण उनका दिल प्रेम रस में भीग गया।

15गुरु अमरदास ने भक्ति द्वारा परमात्मा को वश में कर लिया और वाह-वाह बड़ा मानकर ध्यान किया।

16हे श्री गुरु रामदास ! तुमने प्रभु पद ही पा लिया है, पूरे जगत् में तेरी जय-जयकार हो रही है।॥२॥

17नारद, धुव, प्रहलाद एवं सुदामा पूर्व से ही परमात्मा के अनन्य भक्त माने जाते हैं।

18अंबरीष, जयदेव, त्रिलोचन, नामदेव एवं कबीर सरीखे परम भक्तों का

19कलियुग में अवतार हुआ, इनका यश पूरे जगत में फैला हुआ है।

20पर हे श्री गुरु रामदास ! तुमने तो परमात्मा का पद पा लिया है, जगत भर में तेरी जय जय हो रही है॥३॥

21हे गुरु रामदास ! जो व्यक्ति दृढ़संकल्प से तुम्हारा स्मरण करते हैं, उनका काम-क्रोध सब मिट जाता है।

22जो मन, वचन से तुझे स्मरण करते हैं, पल में ही उनका दुख-दारिद्रय मिट जाता है।

23जो कर्मेन्द्रियों से तुम्हारा दर्शन व चरण स्पर्श करता है, पारस समान (महान्) हो जाता है, इसलिए बल्य भाट भी तुम्हारा ही यश गाता है।

24हे श्री गुरु रामदास ! तुमने ईश्वर का पद पा लिया है, संसार भर में तुम्हारी जय-जय हो रही है॥४॥

25जिस सतिगुरु (रामदास) के स्मरण से आँखों का अज्ञानाधंकार पल में मिट जाता है।

26जिस सतिगुरु (रामदास) का सिमरन करने से हृदय में दिनों-दिन हरिनाम अवस्थित होता है।

27जिस सतिगुरु का स्मरण करने से दिल की जलन मिट जाती है।

28जिस सतिगुरु को याद करने से ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ एवं नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं।

29भाट बल्ह का अनुरोध है कि उस गुरु रामदास की संगत में मिलंकर प्रशंसागान करो।

30जिस सतिगुरु की शरण में प्रभु प्राप्त होता है, सो ऐसे सतिगुरु रामदास का हे लोगो ! हर वक्त स्मरण करो ॥५॥५४॥ (भाट बल्ह के पाँच सवैये पूरे, कुल चौवन सवैये हुए)

31जिस (गुरु रामदास) ने ब्रह्म-शब्द की साधना करके परमपद पाया, अपने गुरु अमरदास जी की सेवा में तन-मन से तल्लीन रहे और उनका साथ कभी न छोड़ा,

32इसलिए परम ज्ञान का उजाला हुआ और दुख-दारिद्रय का अंधेरा नष्ट हो गया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं