गुरु ग्रंथ साहिब 1404 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Gayandh
1गुरु की कृपा से ही परमार्थ प्राप्त होता है और सत्संगति में मन हरिनाम सिमरन में लीन होता है।
2हे गुरु-परमेश्वर ! तू प्रशंसा का हकदार है, यह संसार सब तेरी रचना है, पंच तत्वों को मिलाकर तूने बड़ा खेल तमाशा रचा है ॥३॥१३॥४२॥
3परमेश्वर अगम्य, अनंत, अनादि है, उसका आरंभ कोई नहीं जानता।
4शिव, ब्रह्मा भी उसी का ध्यान करते हैं, नित्य वेद भी उसी की महिमा-गान करते हैं।
5वह निराकार है, प्रेम की मूर्ति है, उस जैसा बड़ा दूसरा कोई नहीं।
6वह तोड़ने एवं बनाने में पूर्ण समर्थ है, वह प्रभु संसार-सागर से पार उतारने वाला जहाज है।
7जिसने अनेक प्रकार का जगत बनाया है, मथुरा भाट रसना से उसी का यश गाता है।
8श्री सत्यस्वरूप सृष्टि रचयिता परमेश्वर गुरु रामदास के दिल में ही रहता है॥१ ॥
9गुरु (रामदास) सर्वकला समर्थ है, इसलिए अटल विवेक बुद्धि, सुमति पाने के लिए उसी का आसरा लिया है।
10उसका धर्म ध्वज सदा फहराता है, वह पाप एवं वासनाओं की तरंगों का निवारण करने वाला है।
11दास मथुरा ने दिल में अच्छी तरह से समझकर सत्य ही बताया है, अन्य कुछ भी विचार योग्य नहीं।
12कलियुग में परमात्मा का नाम सबसे बड़ा जहाज है, केवल वही संसार-सागर से पार उतारने वाला है॥२ ॥
13जो संतों की सत्संगत में आते हैं, वे रंग में रंगकर परमेश्वर का यश गाते हैं।
14दरअसल यह धर्म का रास्ता स्वयं ईश्वर ने चलाया है, जिन्होंने हरिनाम भक्ति में लगन लगाई है, फिर वे इधर-इधर नहीं भटकते।
15मथुरा भाट का कथन है कि ऐसे लोग भाग्यशाली हैं और मनोवांछित फल ही पाते हैं।
16जो गुरु (रामदास) के चरणों में मन लगाते हैं, उनको सूर्य पुत्र यमराज का भी कोई डर नहीं लगता ॥३ ॥
17सतिगुरु रामदास निर्मल नामामृत का एक सरोवर है, जो अमृत से परिपूर्ण है, जहाँ से दिन चढ़ते ही शब्द-गान की लहरें उठती हैं,
18यह गहरा गंभीर, अथाह, बहुत बड़ा है और हर प्रकार से परिपूर्ण एवं रत्नों का भण्डार है।
19संत रूपी हंस यहाँ कौतुक क्रीड़ा करते हैं, उनका मृत्यु का भय एवं दुखों का हिसाब मिट चुका है।
20कलियुग में पाप दूर करने के लिए गुरु रामदास का दर्शन सर्व सुखों का सागर है।॥४॥
21जिसका ध्यान मुनि धारण करते हैं, पूरे जगत में भ्रमण करते हैं और कभी-कभार ही कोई आत्म-प्रकाश पाता है।
22वेदवाणी सहित ब्रह्मा भी जिसके यश को गाता है, जिसके ध्यान में महादेव शिवशंकर भी कैलाश पर्वत को नहीं छोड़ता।
23जिसको पाने के लिए योगी, ब्रह्मचारी, सिद्ध, साधक अनेकानेक तपस्या में लीन रहते हैं, कई जटा-जूट धारण करके वेषाडम्बरी वैरागी बनकर फिरते रहते हैं।
24उस निरंकार के स्वरूप सतिगुरु अमरदास ने स्वाभाविक ही अपनी कृपा (गुरु रामदास पर) धारण की है और इस प्रकार हरिनाम की कीर्ति गुरु रामदास को प्रदान कर दी ॥५॥
25गुरु रामदास के पास नाम रूपी सुखों की निधि है, वे अन्तर्मन में ध्यानशील हैं, उनका तेज तीनों लोकों में फैला हुआ है।
26उनके दर्शनों से सब भ्रम-भटकन निवृत्त हो जाती है और दुख दूर होकर सुख एवं खुशियाँ प्राप्त होती हैं।
27सेवक और शिष्य सदैव ही उन पर यूं लुब्ध होते हैं, ज्यों खुशबूदार फूल पर भैवरा मंडराता है।
28गुरु अमरदास जी ने अपने जीते जी स्वयं गुरु रामदास जी को सच्चे सिंहासन (गुरु नानक की गद्दी) पर स्थापित किया ॥६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं