सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1403 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Gayandh

1तू बेपरवाह है, बड़ा धैर्यवान, धर्म का पुंज, अलक्ष्य, अगम्य है, यह जगत-तमाशा तुमने अपनी इच्छा से ही बनाया है।

2तेरी महिमा अकथनीय है, इसका कथन हम नहीं कर सकते, तू तीनों लोकों में मौजूद है, सहज स्वाभाविक ही तूने रूप धारण किया है, तू बादशाहों का भी बादशाह है।

3हे सतिगुरु रामदास ! तू सत्य है, शाश्वत रूप है, कर्ता पुरुष है, देवी लक्ष्मी तेरी सेवा में तल्लीन है, तू सदैव रहने वाला है। वाह गुरु ! वाह वाह ! वाहिगुरु तू महान् है, तुझ पर मैं कुर्बान जाता हूँ॥३॥८॥

4हे सतिगुरु रामदास ! तू सर्वकर्ता ईश्वर है।

5राजा बलि को छलनेवाला तू ही है, तू पापी-अहंकारी पुरुषों का नाश करने वाला है, भक्ति फल देनेवाला है, तू कृष्ण कन्हैया है, पाप दोषों से रहित है, तेरी महिमा का डंका सब ओर बज रहा है, सूर्य एवं चन्द्रमा तेरी कीर्ति के लिए उदय होते हैं।

6हे राम ! तू सर्वव्यापक है। तू पापों को जलाने वाला है, समस्त लोकों में कल्याण करने वाला है, पूरी दुनिया में मौजूद है, तू देवाधिदेव है, हजारों मुख वाला शेषनाग भी तू है।

7मत्स्यावतार, कच्छपावतार, वाराहावतार में तूने ही कर्म किए और यमुना के तट पर गेंद से खेल कर कालिय नाग का मर्दन तूने ही किया।

8भाट गयंद का मन से यही कथन है कि विकारों को छोड़कर नाम को हृदय में धारण करो, सतिगुरु रामदास करण-कारण, सृष्टि का पालक एवं विधाता है ॥ ४ ॥ ६ ॥

9महामहिम पूज्य गुरु (रामदास) शाश्वत रूप है।

10गुरु जो शिक्षा देता है, उसका सहर्ष पालन करो, चूंकि यह सुखों की निधि सदैव साथ निभाने वाली है। इस सच्चे उपदेश को भलीभांति जान लो, रात-दिन आप का कल्याण होगा एवं परमगति की प्राप्ति होगी।

11काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं लोगों से धोखा करना छोड़ दो, अभिमान का फंदा काट कर साधु पुरुषों की संगत में लीन रहो।

12यह शरीर, घर, स्त्री से प्रेम, यह जगत सब दिल का बहलावा है, अतः अपने मन में गुरु के चरण कमल को सदा के लिए दृढ़ करो।

13भाट गयंद का मन से आग्रह है कि हरिनाम सार को हृदय में धारण करो, विकारों को छोड़ दो। श्री गुरु रामदास सत्यस्वरूप एवं शाश्वत हैं।॥५॥१०॥

14हे गुरु (रामदास) वाह वाह ! युग-युग से तू भक्तों के दिल में बसा हुआ है, तेरी सब कृपा है।

15तू निराकार प्रभु है, तू सदा रहने वाला है, अटल है, कोई नहीं कह सकता कि तेरा अस्तित्व कब से है अर्थात तू अनादि अकालमूर्ति है।

16तुमने अनगिनत ब्रह्मा, विष्णु इत्यादि उत्पन्न किए हैं, उनको मन के अहंकार का ही मोह है।

17तुमने चौरासी लख-योनियों को उत्पन्न किया और सब को रोजी-रोटी देकर उनका पालन कर रहा है।

18हे (गुरु) वाहिगुरु (रामदास) ! युग-युग से तू भक्तों के दिलों में बसा हुआ है, सब तेरी कृपा है॥१॥११॥

19यह सम्पूर्ण सृष्टि रूपी एक बड़ा खेल तमाशा गुरु ही रचकर चला रहा है।

20वह स्वयं ही हँसता है, स्वयं ही सोचता है और स्वयं ही चांद एवं सूर्य को रोशनी दे रहा है।

21जल एवं थल स्वयं गुरु ही है, सबका अवलम्ब है, घट-घट में वही बसा हुआ है।

22यह स्वयं ही नर है और फिर नारी भी स्वयं है। वह स्वयं ही जगत रूपी चौपड़ है और स्वयं ही जीव रूपी गोटियाँ है।

23गुरु की संगत में सब इसी तथ्य का चिंतन करते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि रूपी एक बड़ा खेल तमाशा गुरु ही रच कर चला रहा है॥२ ॥१२ ॥

24हे वाहिगुरु (रामदास) ! तू प्रशंसनीय है, यह संसार रूपी तमाशा सब तेरी रचना है, पंच तत्वों को मिलाकर खेल रचा है।

25तू जल, भूमि, गगन एवं आकाश सब में व्याप्त है, तेरे वचन अमृत की तरह मीठे हैं।

26ब्रह्मा, शिव इत्यादि देवी-देवता सब तेरा ही मनन करते हैं, तू काल का भी काल है, तू माया की कालिमा से रहित है, पूरी दुनिया तुझ से ही मांगती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं