गुरु ग्रंथ साहिब 1402 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Gayandh
1सतिगुरु रामदास की सेवा करो, उनकी महिमा अवर्णनीय है, वास्तव में श्री गुरु रामदास संसार-सागर से पार उतारने वाले जहाज हैं॥२ ॥
2यह संसार असीम सागर है, जिससे परमात्मा का नाम पार करवाने वाला जहाज है और यह गुरु से प्राप्त होता है।
3जब मन में हरिनाम के प्रति पूर्ण आस्था उत्पन्न होती है, तो जग में जन्म-मरण से मुक्ति हो जाती है।
4जिस व्यक्ति के मन में पूर्ण भरोसा हो जाता है, उसे ही उच्च पदवी प्राप्त होती है।
5वह माया-मोह एवं लोभ-लालच को छोड़ देता है और काम-क्रोध की पीड़ा से छूट जाता है।
6जिस सज्जन ने सर्वकर्ता, करण-कारण, दिव्य दृष्टि, परब्रह्म रूप गुरु रामदास को देखा है, उसके सब भ्रम छूट गए हैं।
7सतिगुरु की सेवा करो, जिसकी महिमा अवर्णनीय है, हे जिज्ञासुओ, श्री गुरु रामदास भवसागर से पार लंघाने वाले जहाज हैं।॥३॥
8गुरु रामदास का प्रताप सर्वत्र फैला हुआ है, शिष्य, सेवक उनका ही यश गा रहे हैं।
9कोई प्रभात काल उठकर स्नान करके उनकी अमृतवाणी पढ़ते-सुनते एवं गाते हैं।
10वे प्रातः काल स्नान करके शुद्ध मन से गुरु की पूजा-अर्चना करते हैं।
11गुरु रूपी पारस के स्पर्श से उनका तन कंचन हो जाता है और ज्योति स्वरूप गुरु रामदास का ही वे ध्यान धारण करते हैं।
12संसार का जीवन, जगत का मालिक जल थल सबमें व्याप्त है, अनेक प्रकार से उसी का वर्णन हो रहा है।
13सो ऐसे परमेश्वर रूप गुरु (रामदास) की सेवा करो, उसकी महिमा अवर्णनीय है, हे जिज्ञासुओ, श्री गुरु रामदास भवसागर से पार करवाने वाले जहाज हैं॥४॥
14जिन्होंने गुरु की बात को धुव की तरह निश्चय रूप में मान लिया है, ऐसे व्यक्ति काल से बच गए हैं।
15उन्होंने भयानक संसार-समुद्र एक पल में पार कर लिया है और वे यही मानते हैं कि यह जगत बादलों की छाया समान नश्वर है।
16गुरु की संगत में कुण्डलिनी सुलझ गई है और परमानंद की प्राप्ति हुई है।
17महामहिम गुरु ही मालिक है, सबसे बड़ा है, मन, वचन, कर्म से उसी की सेवा करनी चाहिए ॥५॥
18हे वाहिगुरु ! हे (गुरु रामदास) परमेश्वर ! वाह-वाह, तू प्रशंसनीय है, मैं तुझ पर कुर्बान हूँ।
19तुम्हारे नयन कमल समान हैं, तुम मधुर बोलने वाले हो, करोड़ों के साथ तू शोभा दे रहा है, जिसे यशोदा मैया दही चावल खाने के लिए देती थी, श्री गोपाल कृष्ण तुम ही हो।
20तेरा अनुपम रूप देखकर वह मोह में मोहित हो जाती थी, खेल-खेल में मधुर झंकार तुम ही करने वाले थे।
21मृत्यु की कलम तथा हुक्म तेरे ही हाथ में है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। शिव, ब्रह्मा भी तेरे ज्ञान-ध्यान को हृदय में धारण करना चाहते हैं।
22तू शाश्वत रूप है, देवी लक्ष्मी तेरी सेवा में तल्लीन रहती है, तू रचनहार परमपुरुष है। हे परम परमेश्वर, वाहिगुरु ! तू स्तुति के योग्य है, तुझ पर मैं कुर्बान जाता हूँ॥१॥ ६॥
23तेरा नाम राम है, तू वैकुण्ठ में विराजमान है, परमपवित्र है, बुद्धिमान है, निराकार, बे-अन्त है, तेरे सरीखा (हे गुरु रामदास) कोई नहीं।
24तू सदा रहने वाला है, स्थिरचित है, भक्तों से प्रेम करने वाला है, अपने भक्त की खातिर नृसिंहावतार धारण किया और दुष्ट हिरण्यकशिपु को नाखुनों से चीरकर फाड़ दिया।
25शंख, चक्र, गदा एवं पदम (हे गुरु रामदास) तुम्हीं ने धारण किया हुआ है, तू परे से परे है , वामनावतार में राजा बलि को तू ही छलने वाला है। हे परब्रह्म, तेरा रूप अव्यक्त है।
26(हे गुरु रामदास) तू सत्य है, शाश्वत स्वरूप है, तू ही आदिपुरुष है, देवी लक्ष्मी तेरी सेवा में तल्लीन है। तू सदा रहने वाला है, वाह-वाह मेरे वाहिगुरु (गुरु रामदास) तू महामहिम पूज्य है, मैं तुझ पर सर्वदा कुर्बान हँ ॥२॥७॥
27हे सतिगुरु रामदास ! पीले वस्त्रों में तू ही कृष्ण-कन्हैया है, तेरे मोतियों की तरह सफेद दाँत हैं, अपनी प्रिया (राधा) के साथ आनंद करता है, तेरे गले में वैजयंती माला है, मोर पंखों वाला शीश पर मुकुट धारण किया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं