गुरु ग्रंथ साहिब 1401 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Gayandh
1गुरु के गुणों एवं महिमा का गान करो, क्योंकि गुरु से ही ईश्वर प्राप्त होता है।
2गुरु गहन-गंभीर, बेअंत एवं प्रेम का सागर है, उसमें ध्यान लगाने से ही हरिनाम रूपी मोती, हीरा एवं मणि मिलती है।
3पुनः गुरु का सान्निध्य सरस सुगन्धि भर देता है, वह स्वर्ण की तरह बना देता है, गुरु उपदेश का ध्यान दुर्मति की मैल दूर कर देता है।
4जिसके द्वार से सदैव अमृत का प्रवाह होता है, संत एवं शिष्य गुरु के ज्ञान रूपी निर्मल सरोवर में स्नान करते हैं।
5पावन, सुखनिधान हरिनाम हृदय में धारण करो, गुरु का स्तुतिगान कीजिए, गुरु-गुरु जपो, गुरु से ही परमेश्वर प्राप्त होता है॥३ ॥१५ ॥
6हे मन ! निरन्तर गुरु नाम-मंत्र का जाप करो, उसकी सेवा में तो शिव, सिद्ध, साधक, देव एवं असुर गण भी निमग्न हैं, गुरु का वचन कानों से सुनकर तेंतीस करोड़ देवता भी तैर गए।
7पुनः गुरु-गुरु जपते हुए संत, भक्त, जिज्ञासु भी मुक्त हो गए।
8गुरु को मिलकर भक्त प्रहलाद एवं मुनियों का भी उद्धार हो गया।
9नारद, सनक सनंदन इत्यादि गुरु के सान्निध्य में तिर गए और अन्य सब रस छोड़कर केवल नाम में लीन होकर वे मुक्त हो गए।
10दास नल्ह विनयपूर्वक कहता है कि हरिनाम गुरु से ही मिलता है, हे मन ! हरदम ‘गुरु-गुरु' जाप करते रहो ॥४ ॥१६ ॥२६ ॥ (नल्ह भाट के १६ सवैये और भाट कलसहार के १३ सवैयों सहित कुल २६ सवैये पूरे हुए)
11गुरु-परमेश्वर सबका मालिक है, सबसे बड़ा है,
12जिसने सतयुग में भक्त धुव पर कृपा की।
13उस श्रीहरि ने भक्त प्रहलाद का उद्धार किया,
14माथे पर हस्त-कमल धरकर उसका कल्याण किया।
15उसके अदृश्य रूप को जीव देख नहीं पाते।
16बड़े-बड़े सिद्ध-साधक सब उसी की शरण में रहते हैं।
17गुरु के वचन को सत्य मानकर दिल में धारण कर लो,
18इसी से मनुष्य जन्म एवं शरीर की मुक्ति हो सकती है।
19गुरु ही जहाज है, गुरु ही जहाज का खवैया है,
20गुरु के बिना कोई भी संसार-सागर से तैर नहीं पाया।
21गुरु की कृपा से प्रभु प्राप्त होता है और गुरु के बिना मुक्ति नहीं होती।
22गुरु नानक ईश्वर के निकट रहते थे, उन्होंने भाई लहणा को गुरुगद्दी पर मनोनीत करके संसार में ज्योति को फैलाया।
23गुरु नानक के परम शिष्य गुरु अंगद देव ने सत्य-धर्म का रास्ता (सेवा-सिमरन, हरिनाम का प्रचार) अपनाया।
24उसके बाद (सेवा की मूर्ति) अमरदास भल्ला को गुरुगद्दी पर विराजमान किया।
25उन्होंने (हरिनाम का मनन करके अपने परम शिष्य, हरिनाम के रसिया) श्री रामदास सोढी को गुरु नानक की गद्दी पर स्थापित किया और हरिनाम रूपी सुखनिधि प्रदान की।
26फिर श्री गुरु रामदास जी ने सुखनिधि हरिनाम का चारों दिशाओं में दान दिया अर्थात अनगिनत शिष्यों, भक्तों एवं जिज्ञासुओं को हरिनाम प्रदान किया।
27अपने गुरु (अमरदास) की निष्काम सेवा से उन्हें राज योग का फल प्राप्त हुआ।
28जो उनकी चरण-वंदना करते हैं, शरण में आते हैं, वे सर्व सुख एवं परमानंद पाते हैं और गुरुमुख कहलाने के हकदार हैं।
29गुरु रामदास जी देह रूप प्रत्यक्ष परब्रह्म परमेश्वर ही हैं, वे आदिपुरुष एवं संसार का भरण पोषण करने वाले हैं।
30इसलिए महामहिम सतिगुरु (रामदास) की सेवा करो, उनकी महिमा अवर्णनीय है, वस्तुतः श्री गुरु रामदास भव-सागर से पार उतारने वाले जहाज एवं मुक्तिदाता हैं॥१॥
31जिसके अमृत वचनों एवं मधुरवाणी को साधुजन बड़े चाव एवं दिल से जपते हैं।
32जिससे नित्य आनंद एवं खुशी प्राप्त होती है, उस गुरु (रामदास) के दर्शनों से संसार में जन्म सफल हो जाता है।
33संसार में गुरु रामदास का दर्शन गंगा समान फलदायक है, उनके चरण-स्पर्श परम पवित्र करने वाले एवं मुक्ति प्रदायक हैं।
34पतित प्राणी भी दर्शन मात्र से यमलोक पर विजय पा लेते हैं और भक्तगण कल्याणमय गुरु ज्ञान में रत रहते हैं।
35असल में गुरु रामदास राजा दशरथ के घर रघुवंश तिलक प्रिय राम अवतार में आए, उनकी शरण मुनि भी चाहते थे।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं