सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1400 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Nal

1कलियुग में एकमात्र वही संसार के बन्धनों से मुक्त करने वाला एवं सर्वकला समर्थ है, उसका पावन उपदेश सुनने से जीव प्रभु ध्यान में लीन हो जाता है।

2वह सुख देने वाला सूर्य है, जो उसका ध्यान धारण करता है, गुरु (रामदास) उसके निकट ही रहता है और फिर दुखों का नाश हो जाता है।

3वह पूर्ण पुरुष है, वह अपने मन में ईश्वर का स्मरण करता है, उसके दर्शनों से पाप-दोष निवृत्त हो जाते हैं।

4यदि बुद्धि, ऋद्धि-सिद्धि व ईश्वर को पाना चाहते हो तो हे मन ! गुरु का स्तुतिगान करो, गुरु-गुरु जपते रहो ॥ ५ ॥६॥

5जब गुरु अमरदास जी के भाई जेठा अर्थात् गुरु रामदास जी ने दर्शन किए तो उनको परम सुख प्राप्त हुआ।

6उनके मन में बरसों से अमृतपान की जो प्यास थी, उस अभिलाषा की सिद्धि हेतु ईश्वर ने भाई जेठा अर्थात् गुरु रामदास जी का शांति के पुंज गुरु अमरदास से मिलाप करवा दिया।

7जो मन रसों-वासनाओं के पीछे दसों दिशाओं में दौड़ता था, वह गुरु के मिलाप से तृप्त होकर टिक गया।

8व्यास नदी के किनारे पर जिस नम्रता एवं प्रेम की मूर्ति गुरु अमरदास जी ने वैकुण्ठ समान गोइंदवाल नगर बसाया,

9उस गुरु के दर्शनों से गुरु रामदास जी को बहुत सुख प्राप्त हुआ और उनके वर्षों के दुख दूर हो गए॥६॥१०॥

10समर्थ गुरु अमरदास ने गुरु रामदास के सिर पर हाथ रखा (अर्थात् आशीष देकर उन्हें शिष्य बना लिया),

11उस गुरु ने कृपा करके उनको हरिनाम प्रदान किया, जिस दया की मूर्ति सतिगुरु अमरदास के चरण दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं।

12फिर वे दिन-रात हरि के ध्यान में लीन रहने लगे, उस हरिनाम को सुनकर तो सूर्य-पुत्र यमराज भी डरता हुआ पास नहीं फटकता।

13दास नल्ह का कथन है कि उनको जगद्गुरु की ही आशा थी, पारस समान महान् पुरुष गुरु अमरदास को मिलकर वे भी पारस की तरह महान् हो गए।

14गुरु रामदास जी को ईश्वर ने अटल बना दिया, समर्थ गुरु अमरदास ने उनके सिर पर हाथ धर दिया था ॥७ ॥११॥

15हे पूर्णगुरु ! अब दास नल्ह भाट की इसी तरह लाज बचा लो,

16जैसे भक्त प्रहलाद की लाज बचाई थी और दुष्ट हिरण्यकशिपु को नाखुनों से फाड़ दिया था।

17हे प्रभु ! पुनः तुमने द्रोपदी की लाज बचाई, उसके वस्त्र छीने जा रहे थे तो उसे बहुत सारे वस्त्र प्रदान कर दिए।

18सुदामा को मुश्किलों से बचाया और राम-नाम पढ़ते गणिका का भी जीवन सफल हो गया।

19हे श्री सतिगुरु ! अब इस कलियुग में सुप्रसन्न होकर दास नल्ह भाट की भी लाज बचा लो॥८॥१२॥

20झोलना ॥

21हे प्राणियो, सर्वदा ‘गुरु-गुरु-गुरु' जपते रहो,

22वह भी हरिनाम ही जपता है, वह अपने शिष्यों-जिज्ञासुओं को सुखों का भण्डार नाम ही देता है और अपनी जिव्हा से दिन-रात हरिनाम कीर्तन करता है, इस सत्य को मान लो।

23जो गुरु से उपदेश पाकर ध्यान करता है, वही प्रेम-रंग प्राप्त करता है। हे ज्ञानियो ! कोई अन्य रास्ता छोड़कर परमात्मा का भजन करते रहो।

24गुरु का वचन हृदय में धारण करने से पाँच विकार वश में आ जाते हैं, जन्म सफल हो जाता है एवं पूरी कुल का उद्धार हो जाता है और प्रभु के द्वार पर सम्मान प्राप्त होता है।

25हे प्राणियो, यदि लोक-परलोक में तुम सर्व सुख पाना चाहते हो तो ‘गुरु-गुरु-गुरु' जपते रहो ॥१॥१३॥

26गुरु को सत्य मानकर हरदम उसी का जाप करो और गुरु-गुरु जपते रहना।

27बेअंत गुणों को जानकर सुखनिधान हरि को मन में धारण करो, दिन-रात गुरु के वचन को हृदय में धारण करो।

28पुनः गुरु रूपी अथाह निर्मल जल सागर में स्नान करो, हे संतो, गुरु के शिष्यो ! सच्चे नाम के सरोवर में तैरते रहना।

29जो गुरु (रामदास) सदैव निर्वेर, निराकार, निर्भय परमात्मा का जाप करता है, वह शब्द-गुरु के प्रेम एवं रस में हरिभक्ति ही दृढ़ करवाता है।

30हे मूर्ख मन ! भ्रम छोड़कर गुरु-परमेश्वर का भजन करो, गुरु को सत्य मानते हुए उसका जाप करो, गुरु-गुरु रटते रहो ॥२ ॥१४ ॥ |

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं