गुरु ग्रंथ साहिब 13 · Sohila · Guru Raam Daas Ji
1वैसे ही हे नानक ! कर्ता-पुरुष के उपरोक्त सब स्वरूप ही दिखाई पड़ते हैंII २ II २II
2रागु धनासरी महला १ ॥
3सम्पूर्ण गगन रूपी थाल में सूर्य व चंद्रमा दीपक बने हुए हैं, तारों का समूह जैसे थाल में मोती जड़े हुए हों।
4मलय पर्वत की ओर से आने वाली चंदन की सुगंध धूप के समान है, वायु चंवर कर रही है, समस्त वनस्पति जो फूल आदि खिलते हैं, ज्योति स्वरूप अकाल पुरुष की आरती के लिए समर्पित हैं।॥ १॥
5प्रकृति में तेरी कैसी अलौकिक आरती हो रही है सृष्टि के जीवों का जन्म-मरण नाश करने वाले हे प्रभु !
6कि जो एक रस वेद ध्वनि हो रही है वह मानों नगारे बज रहे हों। ॥१॥ रहाउI॥
7हे सर्वव्यापक निराकार ईश्वर ! तुम्हारी हज़ारों ऑखें हैं, लेकिन निर्गुण स्वरूप में तुम्हारी कोई भी ऑख नहीं है, इसी प्रकार हज़ारों तुम्हारी मूर्तियाँ हैं, परंतु तुम्हारा एक भी रूप नहीं हैं क्योंकि तुम निर्गुण स्वरूप हों,
8सर्गुण स्वरूप में तुम्हारे हज़ारों निर्मल चरण-कमल हैं किंतु तुम्हारा निर्गुण स्वरूप होने के कारण एक भी चरण नहीं है, तुम धाणेन्द्रिय (नासिका) रहित भी हो और तुम्हारी हजारों ही नासिकाएँ है; तुम्हारा यह आश्चर्यजनक स्वरूप मुझे मोहित कर रहा है॥ २॥
9सृष्टि के समस्त प्राणियों में उस ज्योति-स्वरूप की ज्योति ही प्रकाशमान है।
10उसी की प्रकाश रूपी कृपा से सभी में जीवन का प्रकाश है।
11किंतु गुरु उपदेश द्वारा ही इस ज्योति का बोध होता है।
12जो उस ईश्वर को भला लगता है वही उसकी आरती होती है॥ ३॥
13हरि के चरण रूपी पुष्पों के रस को मेरा मन लालायित है, नित्य-प्रति मुझे इसी रस की प्यास रहती है।
14हे निरंकार ! मुझ नानक पपीहे को अपना कृपा-जल दो, जिससे मेरे मन का टिकाव तुम्हारे नाम में हो जाए॥ ४॥ ३॥
15रागु गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
16यह मानव शरीर काम व क्रोध जैसे विकारों से पूरी तरह भरा हुआ है; लेकिन सन्तजनों के मिलाप से तुमने काम, क्रोध को क्षीण कर दिया हैं।
17जिस मनुष्य ने पूर्व लिखित कर्मो के माध्यम से गुरु को प्राप्त किया है, उसका चंचल मन ही ईश्वर में लीन हुआ है॥ १॥
18संत-जनों को हाथ जोड़कर वंदना करना बड़ा पुण्य कर्म है।
19उन्हें दण्डवत् प्रणाम करना भी महान् पुण्य कार्य है॥ १॥ रहाउ॥
20पतित मनुष्यों (माया में लिप्त अथवा जो परमेश्वर से विस्मृत) ने अकाल पुरुष के रस का आनंद नहीं पाया,क्योकि उनके अंतर में अहंकार रूपी कांटा होता है।
21जैसे-जैसे वह अहंकारवश जीवन मार्ग पर चलते हैं, वह अहं का कांटा उन्हें चुभ-चुभ कर कष्ट देता रहता है और अंतिम समय में यमों द्वारा दी जाने वाली यातना को सहन करते हैं।॥ २ ॥
22इसके अतिरिक्त जो मानव जीव सांसारिक वैभव अथवा भौतिक पदार्थों का त्याग करके परमेश्वर के भक्त बन कर उसके सिमरन में लिवलीन रहते हैं, ये आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करके संसार के दुखों से छूट जाते हैं,
23उन्हें नाश रहित सर्वव्यापक परमात्मा मिल जाता हैं और खण्डों-ब्रह्मण्डों में उनको शोभायमान किया जाता है॥ ३॥
24हे प्रभु ! हम निर्धन व निराश्रय तुम्हारे ही अधीन हैं, तुम सर्वोच्चतम शक्ति हो, इसलिए हमें इन विकारों से बचा लो।
25हे नानक ! जीव को तुम्हारे ही नाम का आश्रय है, हरि के नाम में लिप्त होने से ही आत्मिक सुखों की प्राप्ति होती है॥ ४॥ ४॥
26रागु गउड़ी पूरबी महला ५ ॥
27हे सत्संगी मित्रो ! सुनो, मैं तुम्हे प्रार्थना करता हूँ कि यह जो मानव शरीर प्राप्त हुआ हैं, वह संत जनों की सेवा करने का शुभावसर है।
28यदि यह सेवा करोगे तो इस जन्म में प्रभु के नाम-सिमरन का लाभ प्राप्त होगा, जिससे परलोक में वास सरलता से होगा ॥ १॥
29हे मन ! समय व्यतीत होते हुए निशदिन यह उम्र कम हो रही है।इसलिए तुम गुरु से मिलकर उनकी शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन के पार हेतु समस्त कार्य पूर्ण कर लो॥ १॥ रहाउ॥
30इस जगत् में समस्त जीव काम-क्रोधादि विकारों और भ्रमों में लिप्त हैं, यहाँ से कोई तत्वेता यानी ब्रह्म का ज्ञान रखने वाला ही मोक्ष को प्राप्त हुआ है।
31विकारों में लिप्त जिस मानव को ईश्वर ने स्वयं माया रूपी निद्रा से जगाकर नाम-रस पिला दिया, वही उस अकथनीय प्रभु की अलौकिक कथा को जान सका है॥ २॥
32इसलिए हे सत्संगियों ! जिस नाम रूप अमूल्य वस्तु का व्यापार करने आए हो उसे ही खरीदो, इस मन में हरि का वास गुरु द्वारा ही होता है।
33यदि तुम गुरु की शरण लोगे तभी इस हृदय रूपी घर में हरि का स्वरूप बसा सकोगे और आत्मिक सुखों का आनंद प्राप्त करोगे, जिससे फिर इस संसार में आने-जाने का चक्र समाप्त हो जाएगा ॥ ३॥
34हे मेरे अंतर्मन को जानने वाले सर्वव्यापक सृजनहार ! मेरे मन की श्रद्धा को पूर्ण करो।
35गुरु साहिब कथन करते हैं कि यह सेवक सिर्फ यही कामना करता है कि मुझे केवल संतों की चरण-धूल बना दो ॥४ ॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं