सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 139 · Raag Maajh · Guru Angad Dev Ji

1जिन्होंने प्रभु से अपना चित लगाया है, उनकी जगत् में बड़ी शोभा होती है एवं उनकी सुरति सुन्दर हो जाती है॥ २ ॥

2श्लोक महला २॥

3नेत्रों के बिना देखना, कानों के बिना सुनना,

4पैरों के बिना चलना, हाथों के बिना कार्य करना और

5जिव्हा के बिना वचन करना, इस तरह जीवित रहते हुए मृत रहना ।

6हे नानक ! प्रभु का हुक्म पहचान कर प्राणी अपने पति-परमेश्वर को मिल सकता है॥ १॥(अर्थात् नेत्रों से नहीं सुरति द्वारा ईश्वर को देखना चाहिए और स्थूल कानों से नहीं अपितु श्रद्धा से प्रभु का यशोगान श्रवण करना चाहिए और हाथों के बिना मानसिक पूजा रूपी कर्म करना चाहिए, स्थूल जिव्हा के बिना प्रेम जिव्हा से उसका यश करना चाहिए।)

7महला २॥

8मनुष्य को अपने नेत्रों से भगवान सर्वत्र दिखाई देता भी है, वह महापुरुषों से सुनता भी है कि वह सर्वव्यापक है और उसे ज्ञान हो भी जाता है कि वह हर जगह मौजूद हैं परन्तु फिर भी वह उससे मिलकर आनंद प्राप्त नहीं कर सकता। वह भगवान को मिले भी कॅसे?

9क्योंकि उसकी मिलने हेतु उसके पास पैर नहीं है, हाथ नहीं है और आँखे भी नहीं हैं। एक लंगड़ा, अपाहिज और नेत्रहीन पुरुष किस तरह दौड़कर परमात्मा को गले लगा सकता है ?

10तू ईश्वर के भय को अपने चरण, उसके प्रेम को अपने हाथ एवं उसके ज्ञान को अपने नेत्र बना

11नानक कहते हैं कि हे चतुर जीव-स्त्री ! प्रभु से इस तरह ही मिलन हो सकता है॥ २ ॥

12पउड़ी॥

13हे प्रभु! तुम सदैव एक हो, अन्य क्रीड़ा रूपी संसार तूने माया द्वारा पैदा किया है।

14हे नाथ ! तूने अहंकार एवं ममत्व पैदा करके प्राणियों के भीतर लोभ इत्यादि अवगुणों को डाल दिया है।

15हे स्वामी ! जिस तरह तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही जीवों को रखो। प्रत्येक प्राणी वैसा ही कर्म करता है जिस तरह तुम करवाते हो।

16कुछ जीवों को तूने क्षमा करके अपने साथ मिला लिया है और कुछ जीवों को तूने ही गुरु की मति में लगाया है।

17कई तेरे मन्दिर में खड़े होकर भक्ति करते हैं। नाम के अलावा उनको कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

18कईओं को तुमने सत्य कर्म में लगा दिया है। कोई अन्य कर्म उनके लिए लाभहीन है।

19जिन प्राणियों का कर्म तुझे लुभाया है, वे प्राणी स्त्री, पुत्र एवं परिवार से तटस्थ रहते हैं।

20हे प्रभु! ऐसे व्यक्ति अन्दर एवं बाहर से पवित्र हैं और वे सत्य नाम में लीन रहते हैं।॥ ३॥

21श्लोक महला १॥

22चाहे मैं स्वर्गलोक में जाकर सोने के सुमेर पर्वत पर रहने के लिए गुफा बना लूं, चाहे पाताललोक में जाकर जल में रहूँ।

23चाहे मैं धरती अथवा आकाश के किसी लोक में सिर के बल उलटा खड़ा होकर तपस्या करूँ,

24चाहे मैं पूरी तरह शरीर को स्वच्छ करके वस्त्र पहनूं और हमेशा ही यह कर्म करके अपने शरीर एवं वस्त्रों को स्वच्छ करता रहूँ,

25चाहे मैं सफेद, लाल, पीले एवं काले वस्त्र पहनकर चारों वेद-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद का पाठ करूँ,

26चाहे मैं गन्दा एवं मलिन रहूँ। परन्तु यह सब कर्म दुर्बुद्धि होने के कारण व्यर्थ ही हैं।

27हे नानक ! मैं केवल शब्द का चिन्तन करता हूँ, जिसके अलावा किसी भी मूल्य का मैं नहीं था, न ही मैं हूँ और न ही मैं होऊंगा ॥ १॥

28महला १॥

29जो व्यक्ति अपने वस्त्र धो कर एवं स्नान करके संयमी बन बैठता है,

30उसे अपने मन में लगी अहंकार रूपी मैल का पता ही नहीं लगता और वह अपने शरीर को बाहर से ही रगड़ रगड़ कर स्वच्छ करता रहता है।

31वह ज्ञानहीन होता है और कुमार्ग में पड़कर यम के जाल में फंस जाता है।

32वह पराई वस्तु को अपनी समझता है और अहंकारवश बड़े दुख सहन करता है।

33हे नानक ! जब गुरु के माध्यम से मनुष्य का अहंकार नष्ट हो जाता है तो वह हरि-परमेश्वर के नाम का ध्यान करता रहता है।

34वह नाम का जाप करता है, नाम को स्मरण करता है और नाम द्वारा सुख में समा जाता है।॥ २॥

35पउड़ी॥

36भगवान ने संयोग बनाकर तन एवं आत्मा का मिलन कर दिया है।

37जिस प्रभु ने इनकी रचना की है, उसी ने उनको जुदा किया है।

38मूर्ख प्राणी भोग भोगता रहता है और यह भोग ही उसके तमाम दु:खों का कारण बनता है।

39वह सुख की उपलब्धि हेतु पाप करता है और इन सुखों से उसके शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

40हर्ष से शोक तथा संयोग से वियोग और जन्म से मृत्यु उत्पन्न होते हैं।

41मूर्ख प्राणी ने दुष्कर्मों की गिनती गिनाकर जीवन-मृत्यु का विवाद खड़ा कर लिया है अर्थात् मूर्ख दुष्कर्मों में फंस जाता है।

42निर्णय सतिगुरु के हाथ में है, जो इस विवाद को खत्म कर देते हैं।

43सृष्टिकर्ता प्रभु जो करता है, वही कुछ होता है और प्राणी का चलाया हुक्म नहीं चलता ॥ ४॥

44श्लोक महला १॥

45जो व्यक्ति झूठ बोलकर दूसरों का हक खाता है वह मुर्दे को खाता है अर्थात् हराम खाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं