गुरु ग्रंथ साहिब 1398 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Kal
1हे गुरु रामदास ! तूने श्रद्धा की सेज को बिछाया, सहज स्वभाव का शामियाना स्थित किया, संतोष को कनातों के रूप में स्थापित किया और शील-सादगी का सदैव कवच धारण किया, जो बहुत सुन्दर लग रहा है।
2आप ने गुरु के उपदेशानुसार जीवन-आचरण अपनाया (हरिनाम में रत रहे) और हरिनाम का आसरा आपके शिष्य-संगियों को खुशबू पहुँचा रहा है अर्थात् वे भी हरिभक्ति में लीन हो रहे हैं।
3तुम जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त, महान्, पुण्यात्मा हो और सतिगुरु अमरदास की संगत में सेवा-सिमरन में ही मग्न रहे।
4कवि कलसहार का कथन है कि हे गुरु रामदास ! तुम शान्ति के सरोवर में रहते हो ॥ १० ॥
5जिन पर गुरु (रामदास) प्रसन्न होता है, उनके मन में हरिनाम को बसा देता है।
6जिन लोगों पर गुरु (रामदास) की प्रसन्नता होती है, उनके पाप दूर से ही भाग जाते हैं।
7जिन पर गुरु सुप्रसन्न हो जाता है, उनका मान-अभिमान दूर हो जाता है।
8जिन पर गुरु की अपार खुशी हो जाती है, वे प्रभु-शब्द में लीन होकर संसार-सागर से पार उतर जाते हैं।
9जिन लोगों ने गुरु (रामदास) से सच्चा उपदेश पाया है, उनका जगत में जन्म सफल हो गया है।
10कवि कलसहार का कथन है कि महामहिम श्री गुरु रामदास की शरण लो, गुरु की शरण में मुक्ति भुक्ति सब प्राप्त हो जाते हैं॥११ ॥
11सतिगुरु रामदास ने भक्ति रूपी खेमा ताना है, संसार के जीव इसी के नीचे आ गए हैं।
12गुरु के हाथ में ज्ञान का नेजा है, हरिनाम का अवलम्ब है, जिससे भक्त संतुष्ट हो रहे हैं।
13(हरिनाम का सिमरन करके) गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव, गुरु अमरदास एवं अन्य भक्त जन ईश्वर में समाहित हो गए हैं।
14हे गुरु रामदास ! इस राज योग का आनंद तुमने ही जाना है॥१२॥
15जनक वही है, जिसने परम सत्य को जाना और वृति को तुरीय पद में स्थापित किया।
16सत्य-संतोष को अपनाया और खाली मन को नाम से भर दिया।
17अकथनीय कथा उसे प्राप्त होती है, जिसे ईश्वर देता है, वही पाता है।
18यह जनक सरीखा राज हे गुरु रामदास ! तुझे ही शोभा देता है॥१३॥ (भाट कलसहार के १३ सवैये सम्पूर्ण)
19जो एकाग्रचित होकर पूर्ण लगन से मन में सतिगुरु के नाम का जाप करता है, ऐसे व्यक्ति को दुख पाप कैसे घेर सकते हैं।
20गुरु संसार-सागर से पार उतारने वाला ऐसा जहाज है, जिस पर क्षण मात्र अपनी कृपा-दृष्टि धारण करता है, वह जिज्ञासु शब्द का हृदय में चिंतन करता है और उसके काम, क्रोध नष्ट हो जाते हैं।
21गुरु रामदास सब जीवों के दाता हैं, हरिनाम ज्ञान के व्याख्याता वही हैं, वे दिन-रात ईश्वर के ध्यान में निमग्न रहते हैं और थोड़ी देर भी अचेत नहीं होते।
22उनके दर्शनों से दरिद्रता दूर हो जाती है, हरिनाम रूपी सुखों का भण्डार जिज्ञासुओं को प्राप्त होता है। गुरु अपने मुख से ज्ञान प्रदान करता है और दुर्मति की मैल को साफ कर देता है।
23जो एकाग्रचित होकर मन में सतिगुरु का नाम जपता है, उसे दुख पाप कैसे स्पर्श कर सकते हैं॥१॥
24पूर्ण गुरु रामदास से धर्म-कर्म का फल प्राप्त हो जाता है।
25उनकी सेवा तो सिद्ध, साधक, मुनिजन, देवता एवं मनुष्य भी चाहते हैं और जिस सतिगुरु रामदास ने दत्तचित होकर एक ब्रह्म में लगन लगाई हुई है।
26हे गुरु रामदास ! तेरा भेद कौन जान सकता है, तू अपार, निर्भय, निराकार का रूप है और तुझे अकथनीय प्रभु का बोध हो गया है।
27हे संसार के भूले लोगो ! गुरु का उपदेश धारण करो, योनि चक्र से मुक्त हो जाओगे और काल का दण्ड प्राप्त नहीं होगा।
28हे मूर्ख प्राणी! जरा चिंतन कर, दिन-रात हरिनाम का जाप कर, धर्म-कर्म का फल सतिगुरु से प्राप्त हो सकता है॥२ ॥
29मैं सतिगुरु रामदास के सच्चे नाम पर सर्वदा बलिहारी जाता हूँ।
30मैं किससे उपमा दूँ, कौन-सी सेवा करूँ, केवल हाथ जोड़कर मुँह रसना से स्तुतिगान कर सकता हूँ।
31मैं मन, वचन, कर्म से गुरु रामदास को ही मानता हूँ, किसी अन्य को नहीं मानता। गुरु ने वह अपार हरिनाम दिया है, जिसे मन में धारण किया हुआ है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं