गुरु ग्रंथ साहिब 1394 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Kal
1कवि कल्ह का कथन है कि जिन लोगों को विश्व विख्यात श्री गुरु अमरदास जी के दर्शन प्राप्त हुए, उनका जीवन सफल हो गया है।॥
2गुरु अमरदास जी के दाएँ हाथ में पद्म स्थित है और सिद्धियाँ सन्मुख होकर उनका मुख निहार रहीं हैं।
3ऋद्धियाँ उनके बाएँ अंग पर मौजूद हैं, जो तीनों लोकों को मोहित करती हैं।
4उनके हृदय में अकथनीय ईश्वर अवस्थित है, जिसका आनंद उन्होंने ज्ञान लिया है।
5गुरु अमरदास जी मुखारबिंद से ईश्वर की भक्ति-वंदना का उच्चारण करते हैं और इस रंग में ही लीन हैं।
6उनके माथे पर ईश्वर-कृपा का चिन्ह हैं, कवि कल्ह हाथ जोड़कर कहता है कि
7जिसने सच्चे गुरु अमरदास जी का दर्शन-ध्यान किया है, उसकी सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं ॥६॥
8वहीं चरण सफल हैं, जो गुरु (अमरदास जी) के राह पर चलते हैं।
9वहीं हाथ सार्थक हैं, जो गुरु अमरदास जी के चरण छूते हैं।
10जीभ भी असल में वही सफल है, जो गुरु अमरदास जी का यशोगान करती है।
11जो आँखें गुरु अमरदास जी के दर्शन करती हैं, असल में वहीं सार्थक हैं।
12वहीं कान पूर्ण रूप से सफल हैं, जो गुरु अमरदास जी का उपदेश सुनते हैं।
13जिस हृदय में जगत पिता गुरु अमरदास जी बसते हैं, वहीं हृदय सफल है।
14भाट जालप का कथन है कि जो सिर नित्य गुरु अमरदास जी के सन्मुख झुकता है, असल में वही सफल होता है॥१॥१०॥
15(जिस पर गुरु अमरदास जी की प्रसन्नता होती है) ऐसा व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता, वह भूख से रहित रहता है, ऐसे नर को निर्धन भी नहीं कहा जाता।
16ऐसे व्यक्ति को कोई गम-शोक नहीं होता, ऐसे व्यक्ति का रहस्य भी नहीं पाया जा सकता।
17ऐसा पुरुष न ही किसी पर निर्भर रहता है, अपितु हजारों चीजें देने में समर्थ होता है।
18ऐसा मनुष्य ऐश्वर्य सुख भोगता है और बुराइयों को दूर करके अच्छाई की स्थापना करता है।
19ऐसा मनुष्य संसार में सुख ही पाता है और शत्रुओं में सज्जन भावना से रहता है।
20जालप का कथन है कि उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है, जिस पर गुरु अमरदास जी सुप्रसन्न होते हैं ॥ २॥ ११॥
21हे गुरु अमरदास ! तूने एक परमेश्वर का ही मनन किया, मन में एक ओंकार का ही चिंतन किया, केवल एक परम-परमेश्वर को ही माना है।
22तेरे नयनों में, वचनों में, मुँह में केवल परब्रह्म ही बसा हुआ है और उस एक परमशक्ति के बिना किसी अन्य को नहीं माना।
23हे गुरु ! तेरे सपने में भी हरिनाम बसा हुआ है और प्रत्यक्ष भी 'एक' उसी को तू रसिया बना रहता है और तुम एक प्रभु में ही लीन रहते हो।
24महीने के तीस दिनों में भी सर्वदा एक उसी का तू रसिया बना है और पंच तत्वों (पूरे जगत में केवल वही है और पैंतीस अक्षरों में भी ईश-वंदना ही है।
25जिस एक परब्रह्म से लाखों प्राणी बने हैं, हम लाखों की समझ से परे हैं, हे गुरु अमरदास ! तुमने उस एक अलख परमेश्वर का ही वर्णन किया है।
26जालप भाट का कथन हैं कि हे गुरु अमरदास ! तुझे एक परमात्मा की ही अभिलाषा लगी हुई है और उस एक को ही श्रद्धापूर्वक मानते हो ।।३।।१२।।
27जो शिक्षा (नाम जपने की) जयदेव ने ग्रहण की, जो आस्था (हरिनाम में रत रहने की) नामदेव के मन में बसी थी,
28जो शिक्षा (ईश्वर का संकीर्तन करने की) त्रिलोचन के दिल में दृढ़ हो गई थी,
29जो सीख (हरिनाम की) भक्त्त कबीर ने समझी, इसी प्रकार राजा रुफमांगद का यही कर्म था कि वह राम नाम का नित्य जाप करता एवं करवाता था।
30हे भाई! नित्य राम नाम का जाप करो, इसी से राजा अंबरीष एवं भक्त प्रहलाद ने ईश्वर की शरण प्राप्त की।
31भाट जल्ह (जालप) का कथन है कि हे गुरु अमरदास ! तुमने सुमति एवं युक्ति को जानकर लोभ, क्रोध एवं तृष्णा को त्याग दिया है।
32गुरु अमरदास जी ईश्वर के परम भक्त हैं, उनके दर्शनों से मुक्ति प्राप्त हुई है ॥४॥१३॥
33गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से पृथ्वी के पापों का नाश हो जाता है।
34गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श की बड़े-बड़े सिद्ध-साधक भी आकांक्षा करते हैं।
35गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से ईश्वर में ध्यान लगता है और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
36गुरु अमरदास जी के चरण स्पर्श से अभय प्रभु प्राप्त होता है और आवागमन दूर हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं