गुरु ग्रंथ साहिब 1392 · Svaiyay Mehl 5 · Bhatt Kal
1हे गुरु ! तेरा ध्यान सदैव परमात्मा में लगा रहता है और अपनी इच्छानुसार कार्य करने में तुम स्वतंत्र हो।
2जैसे फलों से भरा हुआ पेड़ झुका रहता है, वैसे ही पावन विचारधारा के कारण लोगों की बातों को सहन करते हो।
3तुमने यह तथ्य जान लिया है कि अद्भुत लीला करने वाला अलख प्रभु सब में विद्यमान है।
4तुमने अमृतवाणी द्वारा सहज स्वाभाविक सब को आकर्षित किया है।
5हे गुरु अंगद ! (गुरु नानक देव जी की गद्दी पर आसीन होकर) तुमने गुरु वाला पद पा लिया है और सत्य तेरे मन में अवस्थित है तथा संतोष को ग्रहण किया हुआ है।
6कलसहार का कथन है कि जिन लोगों ने भाई लहणा (गुरु अंगद देव) के दर्शन किए हैं, उन्होंने तो मानो ईश्वर का ही चरण स्पर्श पा लिया है॥६ ॥
7तुम्हारे मन में विश्वास हो गया है, हजरत नानक ने गहन-गम्भीरता प्रदान की है।
8तुम्हारे तन में से मोह रूपी जहर नाश हो गया है और अन्तरात्मा ने नाम अमृतपान किया है।
9तुम्हारा हृदय खिलकर जाग्रत हो गया है, युग-युगांतर रहने वाले अलख ने अपनी शक्ति स्थापित कर दी है।
10जो प्रभु समान रूप से सब में मौजूद है, सतगुरु अंगद स्वाभाविक उसी की समाधि में लीन रहता है।
11हे गुरु अंगद ! तू उदारचित है, गरीबी को दूर करने वाला है, तेरे दर्शनों से पाप-दोष नाश हो जाते हैं।
12कलसहार कहता है कि वह सहज स्वभाव प्रेम से गुरु अंगद देव जी का यश उच्चारण करता है और रसना से उनका नाम जपता है| ॥
13हरिनाम सर्व रोगों की औषधि है, नाम ही जीवन का आसरा है और नाम ही परम सुख प्रदान करने वाला है। हरिनाम पूरे विश्व में शोभायमान है।
14कलसहार का कथन है कि गुरु अंगद देव जी उस हरिनाम में लीन हैं, जो देवताओं एवं मनुष्यों को महक प्रदान कर रहा है।
15जिसने गुरु से नाम पाया है, उसकी कीर्ति सूर्य की तरह चमक रही है।
16सो उस गुरु अंगद देव जी के दर्शन एवं चरण स्पर्श से अड़सठ तीर्थों का स्नान हो जाता है।॥८ ॥
17परम सत्य (हरिनाम) ही गुरु अंगद देव जी का तीर्थ, स्नान है, सच्चा हरिनाम जपना ही उनका भोजन एवं प्रेम है।
18गुरु जी सत्य बोलते (हरिनामोच्चारण करते) शोभा दे रहे हैं।
19गुरु नानक के शब्द द्वारा गुरु अंगद ने सत्य को प्राप्त किया और सच्चा नाम संगत को सुगन्धित कर रहा है।
20कवि कलसहार बखान करता है कि जिस गुरु अंगद का संयम, व्रत सब सत्य (हरिनाम) ही है, उस गुरु के दर्शनों से जन्म सफल हो जाता है।॥६॥
21गुरु अंगद जिस पर भी अपनी शुभ अमृत दृष्टि करते हैं, उसके पाप-दोषों की मैल सब दूर हो जाती है।
22उन्होंने काम, क्रोध एवं लोभ, मोह सब को वश में कर लिया है।
23उनके मन में सदैव सुख बस रहा है और वे संसार के दुखों को दूर कर रहे हैं।
24गुरु अंगद नौ निधियों का दरिया है, जो हमारे जन्मों की पापों की मैल को दूर कर रहा है।
25कवि टल्ल (कलसहार) का कथन है कि दिन-रात सहज स्वभाव गुरु अंगद की सेवा करो,
26उस गुरु के दर्शन से जन्म-मरण का दुख निवृत्त हो जाता है ॥१०॥
27सवईए महले तीजे के ३
28वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।
29उस सत्यस्वरूप परम परमेश्वर का स्मरण करो, जिसका नाम संसार में अछल है।
30जिसने भक्तों को संसार-सागर से पार उतार दिया, उस उत्तम हरिनाम का सिमरन करो।
31गुरु नानक उस हरिनाम के रसिया थे, उस नाम द्वारा भाई लहणा गुरु अंगद के रूप में स्थापित हुए, जिनको सर्वसिद्धियाँ प्राप्त हुईं।
32कवि कल्ह का कथन है कि हरिनाम द्वारा सुबुद्धि वाले गुरु अमरदास जी का यश संसार भर में फैल गया है।
33जैसे मौलश्री के पेड़ की शाखाएँ फैलती हैं, वैसे ही गुरु अमरदास जी का यश सूर्य की किरणों की तरह सब ओर फैल गया है।
34जिस कारण उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में लोग गुरु अमरदास जी की जय-जयकार कर रहे हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं