गुरु ग्रंथ साहिब 1391 · Svaiyay Mehl 5
1सवईए महले दूजे के २
2वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।
3सम्पूर्ण विश्व की रचना करने वाला वह कर्तापुरुष धन्य है, वह करण कारण है, सर्वशक्तिमान है।
4हे गुरु अंगद ! वह सतगुरु नानक भी धन्य है, जिसने तुम्हारे माथे पर वरदहस्त रखा।
5जब गुरु नानक ने माथे पर हाथ रखा तो स्वाभाविक ही अमृत-वर्षा होने लगी, जिससे देवता, मनुष्य, मुनिगण इत्यादि अमृत में भीग गए।
6तूने भयंकर काल को मारकर भगा दिया और कामादिक पाँच विकारों को रोककर मन को वशीभूत कर लिया।
7गुरु नानक के द्वार पर सर्वस्व सौंपकर तुमने पूरे जगत को जीत लिया है, समता की बाजी तुम खेल रहे हो और उन्मनावस्था में निरंकार में ध्यान लगा रखा है।
8कवि कलसहार का कथन है कि जगद्गुरु गुरु नानक देव जी के चरणों में लगकर भाई लहणा (गुरु अंगद) की कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में फैल गई है।॥१॥
9जिस गुरु अंगद की दृष्टि अमृत-धारा के समान है, पापों की कालिमा को दूर करने वाली है, उस गुरु के द्वार का दर्शन करने से अज्ञान का अन्धेरा मिट जाता है।
10जो लोग शब्द का चिंतन करते हैं, कठिन साधना करते हैं, ऐसे व्यक्तियों को गुरु ने संसार-सागर से पार उतार कर बन्धनों से मुक्त कर दिया है।
11वे सत्संगत में स्वाभाविक ही गुरु के वचनों द्वारा जाग्रत हो जाते हैं और नम्रतापूर्वक सदैव प्रेम प्यार में लीन रहते हैं।
12कलसहार का कथन है कि जगद्गुरु गुरु नानक की चरण-शरण में भाई लहणा (गुरु अंगद देव जी) की कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में फैल गई है॥२॥
13हे गुरु अंगद ! तूने तो अपने मन में हरिनाम को ही बसाया है, तुम्हारा निर्मल यश हर तरफ फैला हुआ है, सिद्ध-साधक एवं संतजनों के जीवन का तू ही आसरा है।
14तू ही राजा जनक का अवतार है। संसार में तेरा उपदेश सर्वश्रेष्ठ है, जल में कमल की तरह तू जगत में अलिप्त रहता है।
15तू ही कल्पवृक्ष है, सर्व रोगों को दूर करने वाला और संसार के दुखों का निवारण करने वाला है। तीन गुणों वाले संसारी जीव एकाग्रचित होकर तेरा ध्यान करते हैं।
16कलसहार कहते हैं कि जगद्गुरु गुरु नानक देव जी की शरण में भाई लहणा (गुरु अंगद देव जी) की कीर्ति सम्पूर्ण सृष्टि में फैल गई है॥३ ॥
17हे गुरु अंगद ! तूने हजरत नानक से मान-प्रतिष्ठा प्राप्त की है, गुरु नानक की तन-मन से सेवा करके सफल हुए, अजगर सरीखे असाध्य मन को ऊँचा किया है।
18तेरे दर्शन तो परमात्मा के दर्शन समान हैं, तुम पुण्यात्मा, ज्ञानवान, सर्वज्ञ हो, तुमने गुरु नानक की उच्चावस्था को जान लिया है,
19जिसकी दृष्टि अचल स्थान पर टिकी है, जिसकी बुद्धि निर्मल स्थान पर लगी हुई है, जिसने सहनशीलता का कवच धारण करके माया-शक्ति का नाश कर दिया है।
20कलसहार का कथन है कि जगद्गुरु गुरु नानक देव जी के चरणों में भाई लहणा (गुरु अंगद देव जी) की कीर्ति पूरे जगत में फैल गई है॥ ४॥
21हे गुरु अंगद ! तुम्हारी कृपा-दृष्टि धारण करते ही अज्ञान का अंधेरा मिट जाता है, तुम अपराधों को जला देने वाले एवं पापों का नाश करने वाले हो।
22तुम शब्द के शूरवीर एवं बलवान हो, काम और क्रोध का नाश करने वाले हो।
23तुमने लोभ एवं मोह को वश में कर लिया है, शरण में आने वाले याचक का पालन-पोषण करने वाले हो।
24तुमने आत्म-प्रेम का भण्डार इकठ्ठा किया हुआ है और तुम्हारा वचन अमृत शक्ति की धारा है।
25कलसहार का कथन है कि (गुरु नानक की गद्दी पर विराजमान) सतगुरु अंगद देव शिरोमणि गुरु हैं, जो निश्चय धारण करके गुरु-चरणों में लगता है, वह पार उतर जाता है।
26जगद्गुरु, बाबा फेरुमल का सुपुत्र भाई लहणा गुरु अंगद बनकर राज योग भोग रहा है॥ ५ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं