सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 138 · Raag Maajh · Guru Nanak Dev Ji

1वह इस संसार में आया था और चला गया है और उसका नाम भी मर मिट गया है।

2उसके उपरांत पत्तलों पर भोजन दिया जाता है और कौए बुलाए जाते हैं अर्थात् श्राद्ध किए जाते हैं।

3हे नानक ! स्वेच्छाचारी जीव का जगत् से मोह ज्ञानहीनों वाला है।

4गुरु के बिना सारा जगत् ही भवसागर में डूब रहा है॥ २ ॥

5महला १॥

6मनुष्य के दस वर्ष बचपन में बीत जाते हैं। बीस वर्ष का युवक और तीस वर्ष का सुन्दर कहा जाता है।

7चालीस पर वह पूर्ण होता है। पचास वर्ष में उसके पग पीछे मुड़ जाते हैं और साठ वर्ष में वृद्धावस्था आ जाती है।

8सत्तर वर्ष में उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और अस्सी वर्ष की आयु में वह अपने कार्य नहीं कर सकता।

9नब्बे वर्ष में उसका आसन बिस्तर पर होता है और क्षीण होने के कारण वह बिल्कुल नहीं समझता कि शक्ति क्या है?

10खोज-तलाश करके मैंने देख लिया है, हे नानक ! यह संसार धुएँ का क्षणभंगुर महल है॥ ३॥

11पउड़ी ॥

12हे कर्ता प्रभु ! तू सर्वशक्तिमान एवं अगम्य है। तूने स्वयं सृष्टि की रचना की है।

13तूने अनेक प्रकार के रंग तथा विविध प्रकार के पक्षियों के रंग-बिरंगे पंख उपजाए हैं।

14तू ही जिसने यह सृष्टि-रचना की है, इस भेद को जानता है कि क्यों रचना की है। यह जगत् तेरी एक लीला है।

15कई प्राणी जन्म लेते हैं और कई संसार त्याग कर चले जाते हैं। नाम सिमरन के बिना सभी नाश हो जाते हैं।

16गुरमुख सदैव भगवान के प्रेम में गहरे लाल रंग की भाँति मग्न रहते हैं।

17उस सदैव सत्य एवं निरंजन प्रभु की सेवा करो जो हम सबका विधाता है।

18हे प्रभु ! तू स्वयं चतुर है और जगत् में सबसे बड़ा महापुरुष है।

19हे मेरे सत्य परमेश्वर ! मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ जो एकाग्रचित होकर तेरा ध्यान करते रहते हैं॥ १ ॥

20श्लोक महला १॥

21भगवान ने पंचभूतक तन की रचना करके उसमें प्राण कला प्रदान की है और इसकी रक्षा का प्रबंध किया है।

22मनुष्य अपने नेत्रों से देखता है, और जिव्हा से बोलता है। इसके कानों में सुनने की शक्ति समाई हुई है।

23वह पैरों से चलता है, हाथों से कार्य करता है और जो कुछ उसे मिलता है, उसको पहनता एवं सेवन करता है।

24लेकिन बड़े दुःख की बात है कि जिस परमात्मा ने मानव की रचना की है, उसे यह जानता ही नहीं। अंधा मनुष्य ज्ञानहीन होने के कारण बुरे कर्म करताहै।

25जब मनुष्य का शरीर रूपी घड़ा टूटता है तो वह टुकड़े-टुकड़े हो जाता है और इसकी बनावट पुनः नहीं की जा सकती।

26हे नानक ! गुरु के बिना मान-सम्मान नहीं मिलता और इस मान-सम्मान के अलावा मनुष्य संसार से पार नहीं हो सकता ॥ १॥

27महला २ ॥

28मनमुख ऐसा समझता है कि देने वाले प्रभु से उसकी दी हुई वस्तु उत्तम है।

29उसकी बुद्धिमत्ता, समझ एवं चतुरता बारे क्या कथन किया जाए ?

30चाहे वह अपने घर में बैठकर छिपकर दुष्कर्म करता है परन्तु फिर भी चारों दिशाओं में लोगों को इनका पता लग जाता है।

31जो व्यक्ति धर्म करता है, उसका नाम धर्मात्मा हो जाता है और जो पाप करता है, वह पापी जाना जाता है।

32हे सृजनहार प्रभु ! तुम स्वयं ही समस्त लीलाएँ रचते हो। किसी अन्य की क्यों बात एवं कथा करें?

33हे प्रभु ! जब तक तेरी ज्योति मानव शरीर में है, तब तक तुम ज्योतिमान देहि में बोलते हो। यदि कोई प्राणी दिखा दे कि उसने तेरी ज्योति के अलावा कुछ कर लिया है तो मैं उसको बुद्धिमान कहूँगा।

34हे नानक ! गुरमुख को तो सर्वत्र एक चतुर एवं सर्वज्ञ प्रभु ही दिखाई देता है॥ २॥

35पउड़ी॥

36प्रभु ! तुमने स्वयं ही जगत् को उत्पन्न किया और तुमने स्वयं ही इसको कामकाज में लगा दिया है।

37सांसारिक मोह रूपी नशीली बूटी खाने के लिए देकर तुमने स्वयं ही संसार को कुमार्ग लगा दिया है।

38प्राणी के भीतर तृष्णा की अग्नि विद्यमान है। वह तृप्त नहीं होता और भूखा तथा प्यासा ही रहता है।

39यह संसार सहसा भूल-भुलैया है। यह मरता, जन्म लेता, आता और जाता रहता है।

40सतिगुरु के बिना मोह नहीं टूटता। सभी प्राणी अपने कर्म करके थक चुके हैं।

41हे स्वामी ! जब तुझे अच्छा लगता है, गुरु के उपदेश से प्राणी तेरे नाम की आराधना करके प्रसन्नता से संतुष्ट हो जाता है।

42वह अपने वंश का कल्याण कर लेता है। ऐसे व्यक्ति को जन्म देने वाली माता धन्य है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं