सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1389 · Svaiyay Mehl 5 · Guru Arjan Dev Ji

1हरिनाम का उच्चारण करने से काम, क्रोध, अभिमान एवं तृष्णा सब नष्ट हो जाते हैं।

2यदि प्रभु के चरण कमल को हृदय में धारण किया जाए तो स्नान, दान-पुण्य, तपस्या, शुद्धिकरण का फल प्राप्त हो जाता है।

3हरि ही हमारा साजन, मित्र, सखा एवं बंधु है और वही हमारा जीवन एवं प्राणाधार है।

4गुरु नानक कथन करते हैं कि हमने उस समर्थ स्वामी का आसरा लिया है और उस पर हम सदैव कुर्बान जाते हैं।॥६॥

5जो जिज्ञासु प्रभु के प्रेम रस एवं चरण कमल में अनुरक्त रहता है, उसे किसी शस्त्र अथवा हथियार से काटा नहीं जा सकता।

6जिसका मन भगवान के दर्शन-मार्ग में बिंध जाता है, उसे किसी रस्सी से बांधकर भी रोकना असंभव है।

7जो हरि-भक्तों की चरण-धूलि में लीन हो जाता है, उसे अग्नि भी जला नहीं पाती।

8जिसके पैर प्रभु-मार्ग पर चलते हैं, उसे पानी भी डुबा नहीं पाता।

9गुरु नानक कथन करते हैं कि हरिनाम रूपी बाण से समस्त रोग, दोष, पाप एवं मोह मिट जाते हैं ॥१ ॥१० ॥

10संसार अनेक प्रकार के कार्यों में लगा हुआ है, कई व्यक्ति छः शास्त्रों के चिंतन में लीन हैं।

11कोई विभूति लगाकर तीर्थ यात्रा करता है तो कोई शरीर को निर्बल करके जटाएँ धारण कर लेता है।

12परन्तु भगवान के भजन बिना सब दुख ही प्राप्त करते हैं, ज्यों मकड़ी जाल में फँस जाती है, वैसे ही इनका हाल होता है।

13लोग पूजा, तिलक, सोमपाक इत्यादि अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड कर रहे है ॥२॥११॥२० ॥

14सवईए महले पहिले के १

15वह परब्रह्मा केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।

16मैं एकाग्रचित होकर परम परमेश्वर का ध्यान करता हूँ, वह वर देने वाला है,

17संतों-भक्तों का सदा सहायक है, वह अखिलेश्वर सर्वदा कीर्तियोग्य है।

18मैं उसके चरण-कमल हृदय में बसाकर

19परम गुरु नानक देव जी के गुण गाता हूँ॥१॥

20मैं परम गुरु नानक देव जी के गुणों का गान करता हूँ। वे सुखों क सागर हैं, पापों का निवारण करने वाले हैं एवं शब्द के सरोवर हैं।

21गहन-गंभीर, धैर्यवान, बुद्धिमान व्यक्ति भी सुखसागर गुरु नानक का यशोगान करते हैं, बड़े-बड़े योगी, सन्यासी भी उनके ध्यान में लीन रहते है।

22इन्द्र सरीखे देवता, भक्त प्रहलाद इत्यादि, जिन्होंने आत्मानंद प्राप्त किया है, वे भी उनका स्तुतिगान करते हैं।

23कवि कल्ह का कथन है कि जिन्होंने राज-योग का आनंद प्राप्त किया, मैं उस गुरु नानक का सुयश गाता हूँ॥२॥

24राजा जनक सरीखे एवं बड़े-बड़े योगीश्वर भी हरिनाम में लीन सर्वकला सम्पूर्ण गुरु नानक का यश गाते हैं।

25जिनको माया भी छल नहीं सकती, उनकी स्तुति ब्रह्मा जी के पुत्र सनक, सनंदन इत्यादि, सिद्ध-साधक एवं मुनिजन भी गाते हैं।

26जिसने भक्तिभाव द्वारा अटल पद धारण किया, उस भक्त धुव एवं धौम्य ऋषि ने भी गुरु नानक का ही गुणगान किया।

27कवि “कल्ह” गुरु नानक देव जी का सुयश गाता है, जिन्होंने राज-योग का आनंद लिया है॥३॥

28कपिल ऋषि आदि योगेश्वर उस ईश्वर के अवतार अपरंपार नानक की महिमा गाते हैं।

29जमदग्निं सुत परशुराम भी उनका मंगल कर रहा है, जिसने हाथ में परशु लेकर श्रीराम चन्द्र जी का तेज-प्रताप छीन लिया था।

30जिन्होंने सर्वात्म को जान लिया था, उस गुरु के गुण तो उद्धव, अक्रूर एवं विदुर भी गा रहे हैं।

31कवि कल्ह का कथन है कि जिन्होंने राज-योग का आनंद लिया, मैं उसी गुरु नानक देव जी का सुयश गान कर रहा हूँ॥४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं