गुरु ग्रंथ साहिब 1388 · Svaiyay Mehl 5 · Guru Arjan Dev Ji
1यह शरीर, घर, प्रेम इत्यादि कोई सदा रहने वाले नहीं। हे जीव ! माया में मरत होकर कब तक अभिमान कर सकते हो।
2शाही छत्र, हुक्मनामे, चॅवर या चॅवर करने वाले नाश हो जाएँगे, नदिया के बहाव की तरह तेरी उम्र गुजरती जा रही है, इस सच्चाई को हृदय में तुम सोच नहीं रहे।
3सुन्दर रथ, हाथी-घोड़े, सिंहासन इनको पल में छोड़कर खाली हाथ चले जाना है।
4बेशक आँखों से देख लो, कोई शूरवीर, योद्धा, सेनापति एवं उच्चाधिकारी कोई साथ नहीं चलता।
5किलों का आसरा एवं धन-दौलत से छुटकारा नहीं होगा, आखिरकार पाप करते दोनों हाथ झाड़कर ही जाना पड़ेगा।
6मित्र, पुत्र, पत्नी, सज्जन-सखा पेड़ की छांव की तरह साथ छोड़ देंगे।
7उचित यही है कि दीनदयालु, परम पुरुष, अगम अपार प्रभु का हर पल सिमरन करो।
8नानक विनती करते हैं कि हे श्रीपति, हे नाथ ! तेरी शरण में आया हूँ। हे भगवंत ! कृपा करके मुझे संसार-सागर से मुक्त कर दो ॥५॥
9जीवन की बाजी लगाकर, इज्जत को दांव पर लगाकर, दान लेकर, लूटकर तथा अनेक तरीकों से दिल लगाकर धन-दौलत को जमा किया।
10अपने सज्जनों-दोस्तों, मित्र, पुत्र एवं भाई इत्यादि से छिपाकर रखा।
11दौड़-धूप करके, झूठ की कमाई करते हुए पूरी जिंदगी इसी तरह गुजार दी।
12धर्म-कर्म, संयम, पवित्रता, नियम इत्यादि को अनेक तरीकों से चंचल माया के संग लगाकर खो दिया।
13जिसके फलस्वरूप पशु-पक्षी, पेड़ों, स्थावर पहाड़ों की योनियों में पड़े रहे।
14पर प्राणपति, दीनानाथ हरिनाम का क्षण-पल भर भी भजन नहीं किया।
15यह खान-पान, मीठे पदार्थ, भोजन इत्यादि अन्तिम समय सब कड़वे हो जाते हैं।
16गुरु नानक फुरमान करते हैं कि संतों के चरणों में ही मुक्ति होती है, अन्य माया में मग्न रहने वाले सब छोड़कर चले जाते हैं।॥६॥
17ब्रह्मा, शिव, वेद एवं मुनीश्वर इत्यादि आनंदपूर्वक ईश्वर के गुणों का गान करते हैं।
18इन्द्र, मुनिन्द्र, विष्णु उसी को खोजते हैं, वे कभी धरती में आते हैं और पुनः गगन में चले जाते हैं।
19बड़े-बड़े सिद्ध, मनुष्य, देव और दानव तिल मात्र भी परब्रह्म का रहस्य नहीं पाते।
20प्रियतम प्रभु की प्रीति, प्रेम भक्ति में निमग्न रहने वाले, हरि-भक्त उसके दर्शन में लीन रहते हैं।
21उसे छोड़कर तुम अन्य को चाहते हो, तुम्हारा मुँह, दाँत, जीभ सब घिस जाते हैं।
22हे मूर्ख मन ! दास नानक तुझे यही समझाते हैं कि सुख देने वाले परमेश्वर की वंदना करो ॥७ ॥
23माया के रंग समाप्त हो जाते हैं, भ्रमवश जीव मोह के कुएं में पड़ा हुआ है।
24इतना अहंकार करता है कि आकाश में भी समा नहीं पाता, पेट विष्ठा, हड़ियों एवं कीड़ों से भरा हुआ है।
25वह दसों दिशाओं में दौड़ता है, विषय-विकारों में तल्लीन होकर पराया धन छीनने के कार्य करता है, अज्ञान ने इसी प्रकार ठगा हुआ है।
26यौवन बीत जाता है, बुढ़ापा आने के कारण मनुष्य रोगग्रस्त हो जाता है, यमदूत दण्ड प्रदान करते हैं और इस तरह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
27जीव अनेक योनियों के संकट में नरक भोगता है और दुखों में पड़ा रहता है।
28गुरु नानक फुरमान करते हैं कि जिन्हें प्रभु ने अपनी कृपा करके संत बनाया है, वे प्रभु की प्रेम-भक्ति करके संसार के बन्धनों से मुक्त हो गए हैंil८ ॥
29हरिनामोच्चारण से सर्व गुण एवं फल प्राप्त हुआ है, हमारी हर आशा एवं सब मनोरथ पूर्ण हुए हैं।
30हरिनाम रूपी औषधि ही मंत्र तंत्र है, जो दुखों का नाश करने, सर्व रोगों का निवारण करने के लिए उपयोगी है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं