गुरु ग्रंथ साहिब 1387 · Svaiyay Mehl 5 · Guru Arjan Dev Ji
1मन में यह चाव है कि अपने दर्शन प्रदान करो, तेरी भक्ति से यह मन स्थिर होता है।
2अंधेरे में तेरे नाम का दीया प्रज्वलित हुआ है, जिससे कलियुगी जीवों का उद्धार हुआ है और तेरा नाम स्मरण ही धर्म-कर्म है।
3पंचम गुरु फुरमान करते हैं कि पूरे संसार में परब्रह्म रूप गुरु (नानक) प्रगट हुआ है॥६॥
4सवये स्री मुखबाक्य महला ५
5ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
6यह शरीर जो नाश होने वाला है, मोह-माया में फँसा हुआ है। मैं मूर्ख, कठोर, पापों से मलिन एवं अज्ञानी हूँ।
7मन इधर-उधर दौड़ता रहता है, टिक नहीं पाता और इसने परब्रह्म की महिमा को नहीं जाना।
8यह यौवन, रूप-सौंदर्य माया के नशे में मस्त है और मैं बड़ा अभिमानी बनकर विचरन कर रहा हूँ।
9पराया धन, पराया झगड़ा, नारी एवं लोगों की निंदा ही मन को मीठी एवं अच्छी लगती है।
10मैं छिप-छिपकर छल-कपट एवं मक्कारी के उपाय करता हूँ, लेकिन अन्तर्यामी प्रभु सब करतूतें देख एवं सुन रहा है।
11मुझ में कोई शील, धर्म, दया, सादगी इत्यादि नहीं, अतः प्राणदाता प्रभु की शरण में आ गया हूँ।
12हे श्रीधर ! तू करण कारण है, सर्व समर्थ है, हे नानक के स्वामी ! मुझे संसार के बन्धनों से बचा लो॥१॥
13ईश्वर का कीर्तिगान करना एवं उसकी शरण में आना, दोनों काम पापों को नष्ट करने वाले हैं।
14निरंकार संसार-समुद्र से पार उतारने वाला है, वह सब करने में समर्थ और सम्पूर्ण कुलों का उद्धार करने वाला है।
15हे अचेत मन ! संत पुरुषों की संगत में उपदेश लेकर ईश्वर का स्मरण कर, क्यों मोह के अंधेरे में भटक रहा है।
16जिव्हा से घड़ी, मुहूर्त, या पल भर राम नाम का स्मरण कर लो।
17ओच्छे कार्य अल्प सुख देने वाले हैं, करोड़ों जन्म बन्धनों में फंसकर दुख भोगने की तैयारी किसलिए कर रहे हो?
18गुरु नानक समझाते हैं कि संतों की शिक्षानुसार परमात्मा का भजन करो, अन्तर्मन में प्रभु-रंग में ही लीन रहो।॥ २॥
19हे जीव ! ईश्वर ने पिता का थोड़ा-सा वीर्य माँ के गर्भ में डालकर दुर्लभ शरीर बना दिया।
20तुझे खाने-पीने, अनेकों सुख-सुविधाएँ प्रदान की, तेरे संकटों को काट कर विपतियाँ हरण कर ली।
21तुझे माता-पिता, भाई एवं रिश्तेरदारों को समझने की सूझ प्रदान की।
22धीरे-धीरे दिन-प्रतिदिन तू बढ़ता गया और इस तरह विषम बुढ़ापा निकट आ गया।
23हे गुणविहीन, दीन, माया के कीड़े ! एक घड़ी भर उस स्वामी का स्मरण कर ले।
24नानक विनती करते हैं, हे कृपानिधि ! कृपा करके हमारा हाथ थाम ले और भ्रम की गठरी काट दे॥३ ॥
25हे मन ! तेरा आचरण इस प्रकार है, ज्यों चूहा बिल में अहंकार करता है और महांमूखों जैसी हरकतें करता है।
26तू माया के झूले को झूलता हुआ उसी में मस्त रहता है और उल्लू की तरह भटकता है।
27अपने पुत्र, पत्नी, दोस्तों एवं रिश्तेदारों के सुख के साथ तेरा बहुत मोह बढ़ गया है,
28जो तूने अहंकार का बीज बोया था, उसका अंकुर फूट गया है और पूरी जिन्दगी पापों में गुजर गई।
29मौत रूपी बिल्ली मुँह फैलाकर तुझे देख रही है, परन्तु संसार के सुख-वैभव भोगकर भूखा ही बना हुआ है।
30गुरु नानक का कथन है कि संसार को सपना मानकर सत्संगत में दयालु प्रभु का भजन करो ॥४ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं