सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1386 · Svaiyay Mehl 5 · Guru Arjan Dev Ji

1वह स्वयं ही पूरे जगत को आसरा दे रहा है, अपनी कुदरत को दिखा रहा है, फिर भी रंग, रूप, वर्ण, चित्र, मुँह से इतर है।

2गुरु नानक कहते हैं- जो भक्त प्रभु के दरबार में प्रभु रूप हो गए हैं, एक जीभ से उनका क्या बखान किया जाए।

3हाँ, उन पर मैं सदैव कुर्बान हूँ॥३॥

4हे प्रभु ! तू सर्व गुणों का भण्डार है, तेरे ज्ञान-ध्यान की महत्ता व्यक्त नहीं की जा सकती। तेरा स्थान सबसे ऊँचा है।

5मन, धन, प्राण सर्वस्व तेरा दिया हुआ है, पूरे संसार को तूने एक सूत्र में पिरोया हुआ है, तू इतना बड़ा है कि तेरी उपमा नहीं की जा सकती।

6तेरा रहस्य कोई नहीं जानता, तू अलख अपार देवाधिदेव, सर्वशक्तिमान है। हे प्रभु ! तू सबका पालन कर रहा है।

7दास नानक एक जीभ से उस भक्त का क्या बखान कर सकता है, जो ब्रह्मा रूप हो गया है।

8हाँ, उस पर मैं केवल सदैव कुर्बान हूँ॥४॥

9ईश्वर निराकार है, उससे कोई छल-कपट नहीं कर सकता, वह परिपूर्ण है, अविनाशी है।

10वह खुशियों का घर है, उसके रूप अनन्त हैं, वह पावनस्वरूप एवं सदा खिला रहने वाला है।

11जो बे-अन्त है, पूरी दुनिया उसका गुण-गान करती है, परन्तु उसके गुणों का एक तिल मात्र भी गायन नहीं करती।

12हे प्रभु ! जिस भक्त पर तेरी कृपा हो जाती है, वह तुझ में विलीन हो जाता है।

13वे भक्तजन धन्य हैं, जिन पर परमात्मा कृपालु हो गया है।

14जिसका परमेश्वर रूप गुरु नानक से साक्षात्कार हुआ है, वह जन्म-मरण दोनों से रहित हो गया है॥५॥

15ईश्वर परमसत्य है, सत्यस्वरूप है, केवल वही सत्य कहा जाता है।

16उसके अतिरिक्त दूसरा कोई आदिपुरुष नहीं सुना।

17यदि अमृतमय हरिनाम जपा जाए तो मन को सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं।

18जिस जिज्ञासु ने अपनी जिह्म से नाम का जाप किया है, वह तृप्त हो गया है।

19जिस पर मालिक प्रसन्न होता है, उसी का सत्संगत से प्रेम होता है।

20जिन जीवों का परमेश्वर रूप गुरु नानक से मिलाप हुआ है, उनकी समूची कुल का उद्धार हो गया है॥६॥

21सत्यस्वरूप परमेश्वर की सभा अटल है, उसकी अदालत सदैव स्थिर है, वह सत्य रूप में स्थित है।

22उसका सिंहासन भी शाश्वत है, जहाँ वह विराजमान होता है, वह सच्चा इंसाफ ही करता है।

23सच्चे मालिक ने स्वयं ही संसार बनाया है और (जीव बेशक गलतियों का पुतला है परन्तु) वह कभी भूल नहीं करता।

24उसका नाम रत्न अपार है, जिसकी कीमत ऑकना संभव नहीं, बल्कि अमूल्य है।

25जिस पर ईश्वर कृपालु होता है, उसे ही सर्व सुख प्राप्त होते हैं।

26जिन लोगों को हरि रूप गुरु नानक की चरण-शरण प्राप्त हुई, वे योनियों के चक्र से मुक्त हो गए॥७ ॥

27वह कौन-सा योग, ज्ञान, ध्यान एवं तरीका है, जिससे परमात्मा की स्तुति की जाए।

28हे परमेश्वर ! बड़े-बड़े सिद्ध-साधक (हुए हैं), तेंतीस करोड़ देवता (माने जाते हैं लेकिन वे) भी तेरी महिमा नहीं जान पाए।

29ब्रह्मा, ब्रह्मा के पुत्र सनक, सनन्दन और इनके अलावा शेषनाग भी तेरे गुणों का रहस्य नहीं पा सके।

30तू अगम्य है, तुझे पकड़ में नहीं लिया जा सकता, इसके बावजूद भी सब में व्याप्त है।

31दयालु प्रभु ने जिसकी बन्धनों की रस्सी काट दी है, वही सेवक भक्ति में लगा है।

32जिसने परमेश्वर रूप गुरु नानक से चरण-शरण प्राप्त की, वह लोक-परलोक में से सदा के लिए मुक्त हो गया है॥८॥

33हे प्रभु ! तू दातार है, तू ही देने वाला है, मैं याचक तेरी शरण में आया हूँ।

34मुझे संत-पुरुषों की चरण-धूल प्रदान करो, जिसके द्वारा संसार-सागर को पार करना है।

35मैं विनती करता हूँ, यदि तेरी मर्जी हो तो मेरी अरदास सुन लो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं