गुरु ग्रंथ साहिब 1384 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji
1फकीरों का रहन-सहन बहुत कठिन है, यह ऊँचे भाग्य से ही प्राप्त होता है।॥१११॥
2रात्रिकाल के प्रथम प्रहर की ईश-वन्दना एक फूल की तरह है तथा पिछली रात्रि अर्थात् भोर समय की वन्दना फल समान है।
3जो प्रभातकाल जागकर वन्दना करते हैं, उनको ही परमात्मा से कृपा रूपी फल प्राप्त होता है।॥११२॥
4सम्पूर्ण नियामतें मालिक की हैं, किसी का कोई अख्तयार नहीं है कि दाता उसे भी अवश्य दे।
5कुछ जागकर भी उसकी नियामत को पा नहीं सकते और किसी सोए हुए को वह जगाकर भी दे देता है।॥११३॥
6हे जीव स्त्री ! तू अपने सुहाग (प्रभु) को ढूंढ रही है (यदि नहीं मिला) तो तुझ में ही कोई कमी है।
7जिनका नाम सुहागिन है, उनको किसी अन्य की चाह नहीं ॥११४॥
8अन्तर्मन में यदि सहनशीलता की कमान हो और सहनशीलता का ही चिल्ला हो और
9तीर भी सहनशीलता का ही हो तो फिर ईश्वर इस तीर का निशाना चूकने नहीं देता ॥११५ ॥
10सहनशील व्यक्ति सहनशीलता में रहकर कठिन साधना द्वारा शरीर को जला देते हैं।
11वे खुदा के निकट हो जाते हैं और यह भेद किसी को नहीं देते ॥११६ ॥
12सहनशीलता ही जीवन का मनोरथ है, हे मनुष्य ! यदि तू इसे पक्का कर ले तो
13बढ़कर दरिया बन जाओगे और फिर टूट कर छोटा-सा नाला नहीं बन पाओगे ॥११७ ॥
14बाबा फरीद कहते हैं- फकीरी करना बहुत कठिन है, परन्तु तेरी यह प्रीति दिखावा-मात्र है।
15इस फकीरी राह पर तो कोई विरला ही चल पाता है॥११८ ॥
16मेरा शरीर तंदूर की तरह तप जाए, बेशक हड़ियाँ लकड़ियों की तरह जल जाएँ।
17पैरों से चलकर अगर थक भी जाऊँ तो सिर के बल पर चल पडूं। यदि मुझे मालिक मिल जाए (तो सब कष्ट सहने को तैयार हूँ) ॥११६ ॥
18हे फरीद ! शरीर को तंदूर की तरह गर्म मत कर और न ही हड़ियों को लकड़ियों की तरह जला।
19सिर और पैरों ने तेरा क्या बिगाड़ा है (इनको क्यों दुखी कर रहा है) अन्तर्मन में ही मालिक को देख ॥१२० ॥
20(जीव-स्त्री कहती है) मैं जिस सज्जन प्रभु को ढूंढ रही हूँ, वह सज्जन तो मेरे साथ (मन में) ही है।
21हे नानक ! उस अदृष्ट प्रभु को देखा नहीं जा सकता, वस्तुतः गुरु ही उसके दर्शन करवाता है ॥१२१ ॥
22हंसों (महापुरुषों) को (भवसागर में) तैरते देखकर बगुलों (ढोंगियों) को भी चाव पैदा हुआ,
23पर बगुले बेचारे पानी में डूब गए, उनका सिर नीचे और पैर ऊपर हो गए॥१२२ ॥
24मैं समझा था कि यह कोई बड़ा हंस (महापुरुष) है, तो ही मैंने उसकी संगत की।
25परन्तु यदि मुझे मालूम हो जाता कि यह तो ढोंगी बगुला है तो कभी भी साथ न करती॥१२३॥
26क्या हंस (बड़ा) और क्या बगुला (छोटा), जिस पर ईश्वर की कृपा-दृष्टि हो जाए, वही महान् है।
27गुरु नानक कथन करते हैं कि यदि मालिक की मर्जी हो तो वह काले कौए (बुरे) को भी (भला पुरुष) हंस बना देता है॥१२४ ॥
28जगत रूपी सरोवर में जीव रूपी अकेला ही पक्षी है, जिसे फंसाने वाले (कामादिक) पचास हैं।
29यह शरीर विकार रूपी लहरों में फंस गया है, इनमें से निकलने के लिए हे प्रभु ! तेरी ही आशा है ॥१२५ ॥
30वह कौन-सा अक्षर (शब्द) है, कौन-सा गुण अथवा कौन-सा मंत्र है।
31मैं ऐसा कौन-सा वेष धारण करूँ, जिससे मेरा प्रभु मेरे वश में आ जाए॥१२६ ॥
32उत्तर है- नम्र भाषा अपनाओ, अगर कोई बुरा बोलता है तो क्षमा-भावना का गुण धारण करो, जीभ से मीठा बोलने का मंत्र अपनाओ।
33हे बहिन ! ये तीन सद्गुण हैं, इनका वेष धारण करो, पति-प्रभु तेरे वश में आ जाएगा ॥१२७॥
34जो बुद्धिमान होकर भी खुद को नासमझ समझता हो,
35बलवान होकर भी कमजोर बनकर रहे, (अर्थात् मासूम पर जुल्म न करे)
36जो कुछ भी पास हो, मिल-बांट कर खाता हो, (गरीबों को बांटता हो)
37दरअसल ऐसा मनुष्य ही परम भक्त कहलाता है।॥१२८ ॥
38सब जीवों में सच्चा मालिक ही मौजूद है, इसलिए किसी को कड़वा या बुरा वचन मत बोलो।
39किसी का दिल मत दुखाओ, मोती रूपी हर दिल अमूल्य है।॥१२६ ॥
40सबका मन मोती रूप है, इनको दुखी करना अच्छी बात नहीं।
41यदि तुझे ईश्वर को पाने की आकांक्षा है तो किसी के दिल को दर्द न पहुँचाओ॥१३० ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं