सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1383 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji

1इन बेचारी कब्रों पर रूहें हक जमाकर बैठ गई हैं।

2हे शेख फरीद ! रब की बंदगी कर लो, क्योंकि आज या कल चले जाना है॥६७ ॥

3बाबा फरीद कहते हैं- मौत का बांध भी ऐसा दिखाई दे रहा है, जैसे दरिया का किनारा कभी भी टूट जाता है।

4आगे तप्त अग्नि का नरक सुना जाता है, जहाँ दुष्ट-पापियों की हाहाकार मची हुई है।

5किसी को तो सब सूझ हो गई है (कि यहाँ नेक बनकर रहना है) तो कई बेपरवाह होकर फिर रहे हैं।

6जो अच्छे-बुरे कर्म किसी ने दुनिया में किए होते हैं, वही रब के दरबार में गवाह बनते ॥६८ ॥

7हे फरीद ! दरिया के किनारे पर बैठा हुआ जीव रूपी बगुला मौज-मेले करता है,

8मौज-मस्तियां करते हुए उसे अचानक ही बाज दबोच लेता है।

9रब की मर्जी से मौत रूपी बाज शिकजे में ले लेता है और उसे सब खेल-तमाशे भूल जाते हैं।

10इसी तरह जो मन में याद तक नहीं होता, रब वही कर देता है॥ ६६ ॥

11साढ़े तीन मन का शरीर भोजन-पानी की मदद से चलता है।

12दुनिया में व्यक्ति बहुत सारी आशाएँ लेकर आया था।

13मौत का फरिश्ता शरीर के सब दरवाजे तोड़कर आ जाता है।

14मरणोपरांत व्यक्ति के प्यारे भाई, रिश्तेदार दाह-संस्कार के लिए अर्थों पर बांध देते हैं।

15फिर देखो व्यक्ति की तकदीर चार सज्जनों के कधे पर चला जा रहा है।

16हे फरीद ! दुनिया में जो अच्छे-बुरे कर्म किए होते हैं, वही रब के दरबार में उसके काम आते हैं।॥१०० ॥

17फरीद जी कहते हैं कि मैं उन पक्षियों पर कुर्बान जाता हूँ, जो जंगल में रहते हैं।

18वे ककर चुगते हैं, जमीन पर रहते हैं लेकिन रब की याद को नहीं छोड़ते॥१०१॥

19बाबा फरीद कहते हैं कि (प्रकृति के नियमानुसार) मौसम बदल गया है (जवानी के बाद बुढ़ापा आ गया है), वृक्ष (रूपी शरीर) कांप रहा है, पतझड़ के कारण पते गिर रहे हैं।

20मैंने चारों दिशाएँ ढूंढकर देख ली हैं परन्तु कहीं भी स्थिरता नहीं ॥१०२ ॥

21हे फरीद ! मैं रेशमी कपड़े को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दूँ और मामूली कवल ऊपर ले लूं।

22जिस वेश से मेरा मालिक मिलता है, मैं वही धारण करने के लिए तैयार हूँ॥ १०३॥

23महला ३॥

24गुरु अमरदास जी उपरोक्त श्लोक का उत्तर देते हैं- हे जीव-स्त्री ! रेशमी वस्त्र को क्यों फाड़ रही हो, मामूली कम्बल भी किसलिए पहन रही हो ?

25गुरु नानक फुरमाते हैं कि यदि दिल को साफ किया जाए तो परमात्मा घर बैठे ही मिल जाता है॥१०४ ॥

26महला ५ ॥

27पंचम गुरु संबोधन करते हैं- हे फरीद ! जिन लोगों को धन-दौलत, शोहरत एवं जवानी का अहंकार होता है,

28वे परमात्मा के नाम से खाली ही चले जाते हैं, जैसे बरसात होने से ऊँचे टीले पानी के बिना सूखे रहते हैं।॥ १०५॥

29हे फरीद ! उनके मुँह (राक्षसों सरीखे) बहुत भयानक हैं, जिन्होंने परमात्मा का नाम भुला दिया है।

30ऐसे व्यक्ति संसार में अनेकों दुख भोगते ही हैं, परलोक में भी उनको कोई ठिकाना नहीं मिलता ॥१०६॥

31फरीद जी कहते हैं, हे मनुष्य ! यदि भोर के समय नहीं जागे (बंदगी न की) तो समझो जीते जी भी मृत हो।

32यदि तूने रब को भुला दिया है तो रब ने तुझे नहीं भुलाया (वह तेरा हर काम देख रहा है।॥१०७ ॥

33महला ५॥

34गुरु अर्जुन देव जी संबोधित करते हैं-हे फरीद ! मालिक बड़ा रंगीला है, स्वाधीन है।

35अल्लाह की बंदगी में लीन रहना यही सच्चा श्रृंगार है॥१०८ ॥

36महला ५ ॥

37हे फरीद ! दुख-सुख को एक समान मानो और दिल से बुराइयों को निकाल दो।

38जो अल्लाह को मंजूर है, उसे ही भला मानो तो ही तुझे दरबार में इज्जत मिलेगी ॥१०६॥

39महला ५॥

40गुरु अर्जुन देव जी संबोधित करते हैं- हे फरीद ! दुनिया के लोग माया के साथ ही क्रियाशील हैं और तू भी साथ ही नाच रहा है।

41परन्तु जिसकी अल्लाह संभाल करता है, वह जीव निर्लिप्त रहता है ॥११० ॥

42महला ५॥

43हे फरीद ! दिल इस दुनियादारी में लीन है, परन्तु दुनिया किसी काम नहीं आती।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं