गुरु ग्रंथ साहिब 1382 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji
1इससे शरीर को कोई रोग अथवा बीमारी नहीं लगती और सब कुछ प्राप्त हो जाता है।॥७८॥
2हे फरीद ! यह दुनिया एक सुन्दर बाग है, इसमें जीव रूपी पक्षी एक मेहमान की तरह हैं।
3सुबह होते ही जब (मृत्यु का) बिगुल बज जाता है तो सब उड़ने की तैयारी कर लेते हैं।॥७६॥
4हे फरीद ! जीवन-रात्रि को ईश्वर-भक्ति रूपी कस्तूरी वितरित की जाती है, जो लोग मोह की नींद में रहते हैं, उनको उस में से हिस्सा नहीं मिलता।
5जिनकी आँखें पूरी रात नींद में रहती हैं, उनको भक्ति रूपी कस्तूरी मिलना कठिन है।॥८०॥
6बाबा फरीद कहते हैं कि मैं समझ रहा था कि एकमात्र मैं ही दुखी हूँ परन्तु यह दुख तो पूरी दुनिया में फैला हुआ है।
7मैंने दूर-दृष्टि से देखा तो मालूम हुआ कि हर घर में दुखों की भयंकर आग लगी हुई है॥८१॥
8महला ५ ॥
9पंचम गुरु फरीद जी के हवाले से कहते हैं, हे फरीद ! इस रंगबिरंगी सुन्दर धरती में कॉटों भरा विषैला बाग लगा हुआ है।
10परन्तु जो व्यक्ति गुरु-पीर की कृपा पाता है, उसे दुखाग्नि की ऑच नहीं लगती ॥८२ ॥
11महला ५॥
12गुरु जी फरीद जी के हवाले से कहते हैं- हे फरीद ! सुन्दर शरीर सहित यह जिंदगी बहुत सुन्दर है।
13जिनका परमात्मा से प्रेम होता है, ऐसे विरले ही प्राप्त होते हैं।॥८३॥
14हे नदिया के बहाव ! तू किनारों को मत तोड़, तुझे भी हिसाब देना है।
15लेकिन जिधर रब की रज़ा होती है, बहाव उधर ही चला जाता है॥८४ ॥
16बाबा फरीद कहते हैं कि हे मनुष्य ! दिन दुखों में बीत गया और रात शूल चुभने की तरह गुजर गई।
17किनारे पर खड़ा गुरु रूपी मल्लाह पुकार रहा है कि तेरा जीवन रूपी बेड़ा भैवर में फँस गया है॥ ८५ ॥
18किनारों को ध्वस्त करने के लिए बहुत लम्बी नदी बह रही है।
19परन्तु यदि गुरु रूपी मल्लाह होशियार हो तो जीवन-बेड़े का भैवर भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता ॥८६॥
20हे फरीद ! बातों ही बातों में हमदर्दी जतलाने वाले तो बीस सज्जन मिल जाते हैं परन्तु दुख-तकलीफ में साथ देने वाला सच्ची साथी एक भी नहीं मिलता।
21मैं उन प्यारे सच्चे साथियों के मिलन के लिए उपले के चूर्ण की मानिंद जलता जा रहा हूँ॥८७॥
22फरीद जी कहते हैं कि यह शरीर कुते की तरह बराबर भौंक रहा है (अर्थात् हर वक्त कामना कर रहा है) तो फिर इसके लिए हर वक्त कौन दुखी होवे।
23मैंने तो अपने कानों में रूई दी है, चाहे कितना भी तेज हवा की तरह बोले, मैं इसकी कोई बात नहीं सुनूंगा ॥८८ ॥
24हे फरीद ! रब की खजूरें पकी हुई हैं और शहद की नदियाँ बह रही हैं।
25यहाँ जो भी दिन गुजरता है, वही व्यक्ति की उम्र को घटाता जा रहा है॥ ८६ ॥
26बाबा फरीद कहते हैं, यह शरीर सूखकर हड्डियों का पिंजर हो गया है और कौए पैरों के तलवों पर चोंच मार रहे हैं।
27देख लो, व्यक्ति का बुरा भाग्य, अभी तक रब नहीं मिला ॥६०॥
28फरीद जी कौए को संबोधन करते हुए कहते हैं कि हे काले कौए ! बेशक ढूंढ-ढूंढ कर तूने मेरे शरीर का सारा मांस खा लिया है,
29परन्तु अब मेरे इन दो नयनों को मत छूना, क्योंकि इन्हीं से मुझे प्यारे प्रभु को देखने की आशा लगी हुई है॥६१॥
30हे काले कौए ! मेरे शरीर के पिंजर पर तू चोंच मत मार, बैठा हुआ है तो बेहतर है कि यहाँ से उड़ जा।
31जिस शरीर-पिंजर में मेरा मालिक रहता है, उसका मांस मत खा ॥६२ ॥
32फरीद जी कथन करते हैं कि कब्र बेचारी आवाजें दे रही है कि हे बेघर जीव ! अपने घर में चले आओ।
33आखिरकार तूने मेरे पास ही आना है, इसलिए मरने से मत डर ॥६३॥
34इन ऑखों से देखते ही देखते कितनी दुनिया चली गई है।
35फरीद जी कहते हैं- लोगों को अपनी चिंता लगी हुई है और मुझे अपनी (रब से मिलने की चिंता) लगी हुई है॥६४॥
36फरीद जी बताते हैं कि रब मुझ से कहता है कि हे फरीद ! तू अपने आप को सुधार ले तो मेरा मिलन तुझसे हो जाएगा और मेरे मिलने से ही तुझे सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है।
37अगर तू मेरा ही बनकर रहे तो फिर पूरी दुनिया ही तेरी हो जाएगी ॥६५॥
38नदिया के किनारे पर वृक्ष कब तक धैर्य कर सकता है?
39हे फरीद ! कच्चे घड़े में कब तक पानी रखा जा सकता है, वैसे ही मौत भी निश्चय है॥६६ ॥
40हे फरीद ! ऊँचे महल सूने रह गए और जमीन के नीचे कब्र में जगह मिल गई।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं