गुरु ग्रंथ साहिब 1380 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji
1शेख फरीद अब बूढ़ा हो गया है, बुढ़ापे के कारण उसका शरीर कांपने लग गया है।
2यदि सौ बरस भी जीने को मिल जाएँ तो भी इस शरीर ने मिट्टी ही होना है॥४१॥
3फरीद जी गुज़ारिश करते हैं कि हे मालिक ! मुझे पराए द्वार पर बैठने मत देना अर्थात् किसी पर निर्भर मत करना।
4पर यदि तूने मुझे किसी पर निर्भर ही रखना है तो बेहतर है कि शरीर में से मेरी जान निकाल ले ॥४२॥
5फरीद जी लोहार को संबोधन करते हैं कि तू कंधे पर कुल्हाड़ी और सिर पर पानी का घड़ा रखकर घूम रहा है।
6हे लोहार ! तू उस वृक्ष को काटना चाहता है, जिसके नीचे मैं बैठा हुआ हूँ। फरीद जी कहते हैं कि मैं अपने मालिक को बंदगी द्वारा ढूंढ रहा हूँ और तू कोयले की तलाश में है॥ ४३ ॥
7(बाबा फरीद जी अमीर अथवा गरीब पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं) हे फरीद ! किसी के पास जरूरत से अधिक खाने के लिए आटा है और किसी के पास नमक तक नहीं।
8परलोक में जाकर ही पता चलेगा कि इन दोनों में से किसे दण्ड प्राप्त होता है।॥४४॥
9जिसके पास नगाड़े, सिर पर छत्र झूलते थे, शहनाइयाँ गूंजती थीं और भाट महिमा गाते थे।
10आखिरकार ऐसे राजा-महाराज भी कब्र-चिताओं में सदा की नींद सो गए और यतीमों में जा मिले ॥ ४५ ॥
11हे फरीद ! सुन्दर घर, महल, भवन बनाने वाले भी संसार छोड़कर चले गए।
12वे दुनिया में झूठा सौदा करते हुए कब्र-श्मशानों में जा पड़े ॥४६॥
13हे फरीद ! शरीर रूपी कफनी को अनेकों नाड़ियों के टॉके लगे हुए हैं परन्तु प्राणों को कोई टॉका नहीं लगा हुआ है।
14अपनी-अपनी बारी आने पर सूफी पीर अथवा शेख सब चले गए हैं।॥ ४७ ॥
15हे फरीद ! दो ऑखों के दीयों के जलते ही मौत का फरिश्ता आकर बैठ गया।
16उसने शरीर रूपी किले पर कब्जा कर लिया, इस तरह आत्मा को लूटकर दो दीयों को बुझा गया। अर्थात् शरीर को प्राणविहीन करके ऑखों की रोशनी बंद कर गया ॥४८॥
17फरीद जी कहते हैं कि देख ! कपास का क्या हाल हुआ है (बेलने में बेला गया) तिलों की क्या दशा हुई है। (कोल्हू में पेर कर तेल निकाल दिया गया)
18गन्ने को बेलन में डालकर रस निकाल दिया और कागज़ भी किस तरह पेरा जाता है।हॉडी को बारंबार आग पर रखकर खाना पकाया जाता है और कोयले को हर रोज़ जलाया जाता है।
19जो लोग बुरे कर्म करते हैं, उनको सख्त सजा मिलती है।॥४६ ॥
20फरीद जी दंभी फकीरों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि बेशक कंधे पर मुसल्ला और गले पर कफनी ली हुई है। दिल में काटने के लिए छुरी है, मुंह में गुड़ की तरह मीठी-मीठी बातें करते हैं।
21बाहर से समाज के सामने भले पुरुष दिखाई दे रहे हैं, परन्तु दिल में काली रात की तरह बुरे हैं॥५० ॥
22बाबा फरीद जी कहते हैं- रब की बंदगी में मस्त पुरुषों का यदि कोई शरीर चीर भी दे तो उनका रक्त नहीं निकलता।
23चूंकि रब की बंदगी में रत रहने वालों के शरीर में रक्त नहीं होता ॥५१॥
24महला ३॥
25(श्री गुरु अमरदास जी बाबा फरीद के उपरोक्त श्लोक पर स्पष्ट करते हैं कि) इस शरीर में रक्त ही रक्त है और रक्त के बिना शरीर नहीं होता।
26जो लोग अपने मालिक की बंदगी में लीन होते हैं, उनके शरीर में दरअसल लोभ रूपी रक्त नहीं होता।
27मालिक के भय में रहने से इनका शरीर क्षीण होता है और जिससे लोभ-रक्त निकल जाता है।
28जैसे अग्नि में स्वर्ण इत्यादि धातु शुद्ध हो जाती है, वैसे ही परमात्मा का भय दुर्मति की मैल दूर कर देता है।
29गुरु नानक कथन करते हैं कि वही भक्तजन सुन्दर हैं, जो परमात्मा की भक्ति में लीन होते हैं।॥५२॥
30फरीद जी कहते हैं कि गुरु रूपी ऐसा सरोवर ढूंढ लो, जहाँ से सब वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
31मामूली तालाब ढूंढने का कोई लाभ नहीं, वहाँ तो कीचड़ में हाथ डूबेगा अर्थात् कुसंगति से बदनामी ही होगी ॥५३॥
32हे फरीद ! जवानी में पति-प्रभु का सुख प्राप्त न किया और जब उम्र पूरी होने पर मर गई तो
33जीव-स्त्री कब्र में पुकार करती है, हे प्रभु! मेरा तुझ से मिलन नहीं हुआ ॥५४॥
34फरीद जी कहते हैं कि सिर के बाल, दाढ़ी-मूंछे सफेद हो गए हैं अर्थात् बुढ़ापा आ गया है,
35परन्तु हे बावले मन ! अब भी तू रंगरलियाँ ही मना रहा है।॥५५॥
36फरीद जी समझाते हैं कि घर की छत पर कितना भागा जा सकता है ? अर्थात् घर की छत समान यह जिंदगी भी थोड़ी ही है। अपनी नींद को दूर कर लो।
37जो दिन तुझे गिनती के मिले हैं, वे गुजरते जा रहे हैं।॥ ५६ ॥
38बाबा फरीद सावधान करते हुए कहते हैं कि सुन्दर घर, मकान एवं महलों में दिल मत लगाओ।
39क्योंकि मरने के बाद तेरे ऊपर बेशुमार मिट्टी ही पड़नी है और कोई मित्र नहीं होगा ॥ ५७ ॥
40फरीद जी पुनः चेताते हैं कि बड़े मकानों एवं धन-दौलत से ही दिल न लगाओ, मौत अटल है, इसे सदा याद रखना।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं