गुरु ग्रंथ साहिब 137 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1लोक-परलोक में जीव-स्त्री उस प्रभु की है, जिसका बड़ा परिवार है।
2प्रभु सर्वोच्च एवं अगम्य है। उसका ज्ञान अथाह है और उसके आर-पार का कोई अन्त नहीं।
3उसे वही सेवा भली लगती है जो सन्तों की चरण धूलि बनकर की जाती है।
4वह परमात्मा दीनानाथ एवं दयालु है और पापियों का कल्याण करने वाला है।
5सृष्टि के आदि-जुगादि काल से ही सृजनहार का सत्य नाम भक्तों की रक्षा करता रहा है।
6स्वामी के मूल्य को कोई भी नहीं जानता और न ही कोई इसका वजन करने वाला है।
7हे नानक ! जो परमात्मा गणना से परे है, वह मन एवं तन में निवास कर रहा है।
8मैं सदैव उन पर बलिहारी जाता हूँ जो परमात्मा की दिन-रात सेवा करते हैं।॥ २॥
9संतजन हमेशा ही भगवान की आराधना करते रहते हैं,
10जो समस्त जीवों पर क्षमावान है और जिसने आत्मा एवं तन की सृजना की है और दया करके प्राण प्रदान किए हैं।
11हे प्राणी ! गुरु के शब्द द्वारा उस प्रभु की आराधना करनी चाहिए और निर्मल मंत्र रूपी नाम को स्मरण करना चाहिए।
12उस अनन्त परमेश्वर का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
13उस व्यक्ति को ही भाग्यवान कहा जाता है, जिसके हृदय में नारायण निवास करता है।
14प्रभु-पति को मिलने से हृदय की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
15नानक ईश्वर की स्तुति करने से जीता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं।
16दिन-रात जो ईश्वर को विस्मृत नहीं करता वह प्राणी कृतार्थ हो जाता है॥ ३॥
17सर्वकला सम्पूर्ण परमेश्वर परिपूर्ण है। मुझ निराश्रित का तू ही आश्रय है।
18अपने हृदय में मैंने प्रभु का आश्रय लिया हुआ है और मैं नाम स्मरण एवं चिन्तन करने से जीता हूँ।
19हे ईश्वर ! अपनी ऐसी कृपा कीजिए जो तेरे दासों की चरणधूलि के साथ मैं मिल जाऊँ।
20हे नाथ ! जिस तरह तुम मुझे रखते हो, वैसे ही मैं रहता हूँ। जो तुम मुझे देते हो, मैं वही पहनता और खाता हूँ।
21हे प्रभु ! मुझे वह उपाय प्रदान करो जिससे मैं संतों से मिलकर तेरा यशोगान करूँ।
22तेरे सिवाय में किसी अन्य का ख्याल नहीं कर सकता। फिर मैं विनती करने के लिए कहाँ जाऊँ ?
23हे प्रभु ! तुम अज्ञान का नाश करने वाले हो, तमोगुण के भी विनाशक, सर्वोच्च, अगम्य एवं माप से रहित हो।
24हे प्रभु ! नानक का एक यही स्वार्थ है कि मुझ बिछुड़े हुए मन को अपने साथ मिला लो।
25हे प्रभु ! उस दिन सर्व कल्याण होगा अर्थात् मोक्ष जानूंगा, जब मैं गुरु के चरण स्पर्श करूँगा॥ ४॥ १॥
26वार माझ की तथा सलोक महला १ मलक मुरीद तथा चंद्रहड़ा सोहीआ की धुनी गावणी ॥
27ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
28श्लोक महला १॥
29गुरु नाम का दाता है और गुरु ही हिम अर्थात् शांति का घर है। गुरु ही तीनों लोकों में ज्ञान का प्रकाश करने वाला दीपक है।
30हे नानक ! नाम रूपी पदार्थ जीव को अमर करने वाला है, यदि मनुष्य का मन गुरु की शरण लेने हेतु विश्वस्त हो जाए तो सुख उपलब्ध हो जाता है॥ १॥
31महला १॥
32अपने जीवन की प्रथम अवरथा बचपन में प्राणी माता के दुग्ध से प्रेम पाता है।
33द्वितीय अवस्था में उसको अपने माता-पिता का ज्ञान होता है।
34तृतीय अवस्था में वह अपने भाई, भाभी एवं अपनी बहन को पहचानता है।
35चौथी अवस्था में उसमें खेलने की रुचि उत्पन्न हो जाती है।
36पंचम अवस्था में वह खाने-पीने की ओर दौड़ता है।
37छठी अवस्था में उसके भीतर कामवासना उत्पन्न होती है और वह कामवासना से अंधा हुआ जाति-कुजाति भी नहीं देखता।
38सप्तम अवस्था में वह धन-दौलत एकत्रित करता है और अपने घर में निवास कर लेता है।
39आठवीं अवस्था में उसका तन क्रोध में नष्ट हो जाता है।
40नौवीं अवस्था में उसके बाल-सफेद हो जाते हैं, और उसका सांस लेना कठिन हो जाता है।
41दसवी अवस्था में उसका शरीर जल कर भस्म हो जाता है,
42उसके संगी साथी चिता तक उसके साथ जाते हैं और अश्रु बहाते हैं।
43राजहंस (आत्मा) उड़ जाती है और जाने का मार्ग पूछती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं